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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Saturday, 24 March 2012

पद्य - ५‍१ - लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत


लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत




लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत ।
मुदा हम छी अहीं केर, अहीं केर रहब ।।




लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत ।
मुदा हम छी अहीं केर, अहीं केर रहब ।।



नाम अहीं केर जपै छी, हम आठो पहर ।
ध्यान अहीं केर रहैछ, नञि केओ दोसर ।
अहाँ मानू  ई सत्य, हम अहीं केर रहब ।
लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत ।।



साओन–भादो केर राति वा हो चैती बसन्त ।
जेठ हो कि अषाढ़ , वा हो ठिठुरल हेमन्त ।
हाबा बहितहि रहैछ, हाबा बहितहि रहत ।
लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत ।।



नञि कहियो मिझाइछ, प्रेम थिक ओ अनल ।
जरि अमृत भऽ जाइछ, वासना  केर  गरल ।
अहाँ अन्तऽहि सही, मन अहीं केर रहत ।
लोक एहिना कहैछ,  लोक एहिना कहत ।।







डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”                                
विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ५१ , अंक ‍१०२ , ‍१५ मार्च २०१२ मे “स्तम्भ ३॰७” मे प्रकाशित ।


3 comments:

  1. भाइ लोकनि, मत प्रदान करबाक लेल बहुत बहुत धन्यवाद ।


    परञ्च इहि ठाम कहए चाहब कि "पहिने नञि बूझल छल" मत केवल "विज्ञान व इतिहासादि विषयक हमर मैथिली लेख" केर लेल प्रयोज्य थिक । हर ब्लॅग केर लेल पृथक - पृथक ऑप्शन नञि थिक तेँ ओ कविता आ गीत आदिक नीचाँ मे सेहो आबि रहल अछि ।

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