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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Sunday, 25 October 2015

पद्य - ‍१‍२‍२ - मैथिली वर्णमाला (बाल कविता)

मैथिली वर्णमाला (बाल कविता)







सँ अल्हुआ,    सँ आलू,    सँ भेलै  इजोत ।
सँ ईंटेबा    सँ उल्लू,   केर  ऊन  छै मोट ।।

सँ एक  आ   सँ ऐहब,    सँ भेलै  ओसारा ।
प्रायः अओ  लीखल जाइए,  मैथिलीमे बेचारा ।।

अं अंगूर आ अः विसर्ग केर  चिन्हमात्र  भऽ सूतल ।
सँ ऋषि आ ऋक्ष भालु छै,  ऋचा वेदकेर बूझल ।।

ऋ केर दीर्घ रूप  बिनु मैथिली,  कऽ लैतछि संतोष ।
कनैल,   - खाट  आ   सँ गदहा छै निर्दोष ।।

सँ  घोड़ा घास आ घोड़न,   छै  खाली  हाथ ।
सँ चौकी,    सँ छौंकी,    सँ  भेलै जहाज ।।

सँ  झब्बा या झाबा  कहू,    प्रारम्भ ने शब्द ।
सँ टमाटर,   सँ ठेला,    डम्फा  केर  शब्द ।।

 सँ  ढाकी – ढौआ – ढैंचा,  ढ़  फराक   उच्चार ।
तहिना ड़ मैथिलीमे,  अलग - अलग उच्चार ।।

ढोलक केँ ढ़ोलक जुनि लीखू  आ  पढ़ुआ केँ पढुआ ।
सँ डमरू,  ड़ रब्बड़ मे,  हिन्दी  नञि छी बौआ ।।

ढोढ़ी मे  दुहु संग - संग,  तहिना ढाढ़स मे देखियौ ।
पढ़ै छी मैथिली मैथिली बाजू, हिन्दी सनि ने बजियौ ।।

सेहो निःशब्द  मुदा  उपयोग  बहुत अछि एकरो ।
हण्डा - हण्डी, ठण्ढा - ठण्ढी, अण्डा - अण्डी सगरो ।।

सँ  तौला - तबला - तरुआ,  सँ थौका फूलक ।
थऽन गाए बकरी आ महीषक, थाल पएर मे लागल ।।

सँ दीप दूध आ दऽही, दूरा - दरबज्जा ओ दलान ।
सँ धरती धाप धरोहरि, धऽनी धोती धार आ धान ।।

पाँचम व्यञ्जन छै दुलारू, बहुत जकर बेबहार छै ।
नदी नाह नढ़िआ  आ नेबो,  नारिकेर ओ नाक छै ।।

सँ पानि आ सँ फूल - फर, सँ बकरी बुझले ।
सँ भारत देश अपन छी, केर महिमा सुनि ले ।।

सनि केर हिस्सामे सेहो, शब्दक  बहुत  पथार ।
सँ मड़ुआ माछ मखान आ  माए मैथिलीक प्यार ।।

सँ  यमुना  कहबै  जमुना,   – रस्सी  मजगूत ।
सँ  लावा  चन् – चन्  बाजय,  लाबा तकरे रूप ।।

संस्कृतक जे  मूल शब्द,  ओहिमे    केर  बेबहार ।
मिथिलाभाषा केर  बदला,    केर  बड़  उच्चार ।।

सँ शंख - शरीफा - शलगम, केर मान छै अल्प ।
 बहुधा  मैथिली  भाषामे,     केर  कायाकल्प ।।

भाषाकेँ भाषा पढ़ैछ केओ,  आन कहैतछि भाखा
उच्चारण दुहु छी प्रशस्त, पर लिखना जाइछ भाषा।।

केँ  बहुधा बजैत  छी,  भाषा  कहलहुँ  भाखा ।
षष्ठी – खष्ठी  सुनने  होएब, अभिलाषा – अभिलाखा ।।

सँ सिन्दूर सिउँथ आ सपरी,  साबुन सेब  सेमार ।
सँ हाथी - हाथ - हृदय आ सँ  होइछ  हजार ।।

क्षत्रज्ञ  संयुक्ताक्षर,  मानैत अछि पुरना भाषा ।
पर स्वतन्त्र सनि आखर तीनू, विचरए नवका भाषा ।।

क्षत्रिय – रक्षक – भक्षक - रक्षा मे क्ष हुलकी मारए ।
त्र – त्रिशूल, त्रिभुवन, त्रिवेणी; त्रि तँऽ तीन कहाबए ।।

ज्ञ सँ ज्ञान, आ ज्ञान सँ ज्ञानी,  संज्ञा नाँओ कहाबए ।
विज्ञानक ई  युग छी बौआ,  जिनगी सरल बनाबए ।।








नोटः- एहि कवितामे विभक्ति चिन्हकेँ फुटका कऽ लीखल गेल अछि ताकि धियापुतासभकेँ पढ़बामे सुविधा होअए ।


ई कविता मैथिली पाक्षिक इण्टरनेट पत्रिका विदेह केर ‍190म अंक (‍15 नवम्बर 2015) (वर्ष 8, मास 95, अंक ‍190) केर "बालानां कृते" स्तम्भमे प्रकाशित ।



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