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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Thursday, 29 March 2012

मैथिली साहित्यकार संक्षिप्त परिचय पात - ३

प्रो॰ (स्व॰) हरिमोहन झा
Prf. (Late)  HARIMOHAN  JHĀ







जन्म
१८ सितम्बर ‍१९०८ ई॰

जन्म स्थान
कुमर बाजितपुर, वैशाली, मिथिला, भारत

पिता
पं॰ (स्व॰)  जनार्दन झा "जनसीदन"

सद्गति
१९८४ ई॰

मैथिली मे प्रकाशित कृति
‍१) कन्यादान (‍उपन्यास,१९३३ ई॰, मैथिलीक पहिल फिल्मक आधार ग्रण्थ) 
२) द्विरागमन (‍उपन्यास, १९४३ ई॰) 
३) प्रणम्य देवता (‍व्यङ्ग्य कथा संग्रह, १९४५ ई॰) 
४) खट्टर ककाक तरंग (व्यङ्ग्य कथा संग्रह, ‍१९४८ ई॰) 
५) एकादशी (व्यङ्ग्य कथा संग्रह, ) 
६) रंगशाला (‍व्यङ्ग्य कथा संग्रह,१९४९  ई॰) 
७) चर्चरी (व्यङ्ग्य कथा संग्रह, ‍१९६० ई॰) 
८) जीवन यात्रा ( जीवनी, ‍१९८४ ई॰, मरणोपरान्त ‍१९८५ ई॰ मे साहित्य अकादमी पुरुस्कार) 
९) हरिमोहन झा रचनावली , भाग ‍१ - ४ (पहिल ३ भाग मे उपरोक्त रचना सभ संकलित, ४म भाग मे अप्रकाशित पद्य रचना सभक संकलन) 

Wednesday, 28 March 2012

मैथिली साहित्यकार संक्षिप्त परिचय पात - २


स्व॰ आरसी प्रसाद सिंह
Late  ĀRASĪ PRASĀD SINGH










जन्म
१९ अगस्त ‍१९‍१‍१ ई॰

जन्म स्थान
एरौत, समस्तीपुर, मिथिला, भारत

सद्गति
‍१५  नवम्बर १९९६ ई॰

प्रकाशित कृति

‍१) मा‍टिक दीप (मैथिली काव्य संग्रह)
२) पूजाक फूल (मैथिली काव्य संग्रह) 
३) मेघदूत (मैथिली काव्यानुवाद)
४) सूर्यमुखी ( मैथिली काव्य संग्रह, एहि पोथी पर ‍१९४८ ई॰ मे साहित्य अकादमी पुरुस्कार) 
५) कागज की नाव (हिन्दी) 
६) अनमोल वचन (हिन्दी)



मैथिली मे अप्रकाशित कृति
) कविता संग्रह
२) विविधा

 

Tuesday, 27 March 2012

मैथिली साहित्यकार संक्षिप्त परिचय पात - ‍१



मैथिली कोकिल, महाकवि, “विद्यापति”
MAITHILĪ KOKIL, MAHĀKAVI , “VIDYĀPATI”
















मूल नाँव
स्व॰ विद्यापति ठाकुर




जन्म स्थान
बिस्फी या बिसपी(मधुबनी, मिथिला, भारत) 




काल
१३६० ई॰ सँ ‍१४४० ई॰ धरि लगभग (अनुमानित)




समकालीन राजाश्रय
‍१) राजा शिवसिंह
२) राजा भोगेश्वर सिंह




उपाधि
‍१) मैथिली कोकिल, 
२) महाकवि, 
३) अभिनव जयदेव




प्रमुख रचना


"मैथिली पदावली"
(जकर संख्या हजारहु मे अछि आ एखनहु प्राप्त रचना सभ पुर्ण 
संख्याक द्योतक नञि कहल जाइछ) 




आन रचना सभ


‍१) मणिमञ्जरी (पहिल रचना, नाटक, संस्कृत), 

२) पुरूष परीक्षा, 

३) लिखनावली,

४) कीर्त्तिलता, 

५) कीर्त्तिपताका, 

६) शैवसर्वस्वसार,

७) वर्षकृत्य, 

 ८) दुर्गाभक्तितरङ्गिनी, 

९) भू - परिक्रमा, ‍

१०) विभागसार, 

‍१‍१) दानवाक्यावली,

‍१२) गोरक्षविजय,

‍१३) गयापुत्तलक



चलचित्र निर्माण (विद्यापति केर जिनगी सँ सम्बन्धित) 
‍१विद्यापति (हिन्दी, ‍१९३७ ई॰, देबकी बोस निर्देशित), 
२) विद्यापति (हिन्दी, १९६४ ई॰, प्रह्लाद शर्मा निर्देशित), 
३) कखन हरब दुख मोर (मैथिली,२००५ ई॰, संतोष बादल निर्देशित ‍) 


विशेष (प्रेरणास्रोत)
‍१) बाङ्गलाक प्रशिद्ध कवि "गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर" हिनकहि सँ प्रेरित भऽ "भानुसिंहेर पदावली" नाम सँ प्रारम्भिक रचना सभ कएलन्हि । 
२) बङ्गाल व उड़ीसा मे विद्यापतिक परवर्ती साहित्कार विद्यापति सँ प्रेरित भए हुनिकहि सदृश रचना करबाक क्रम मे "ब्रजबूलि" (व्रजबोली नञि)  नामक एक गोट नऽव साहित्यिक भाषा केँ जन्म देलन्हि जे वस्तुतः मैथिलीक संग बाङ्गला वा उड़िया केर मिश्रित स्वरूप छल (ब्रजबूलि = मैथिली + बाङ्गला वा उड़िया)  ।

Saturday, 24 March 2012

पद्य - ५४ - कोन खुशिएँ नाचि रहलह

 
कोन  खुशिएँ  नाचि रहलह



अजेय दुर्गक,  आइ हर  प्राचीर  विक्षत
(सन्दर्भ छायाचित्रः- नौलक्खा महल, राजनगर, मधुबनी, मिथिला, भारत) 



मोन  कहइछ “शशि” ने तोँ  होरी मनाबह ।
कोन  खुशिएँ  नाचि रहलह - से बताबह ??



स्वर्ग मिथिला बनल छह, नर्कहु सँ बत्तर ।
अजेय दुर्गक,  आइ हर  प्राचीर  विक्षत ।
माए मैथिली – तोहर जननी, केर हृदय मे,
व्याप्त  दुख केर  होलिका - पहिने जराबह ।। मोन कहइछ ..........



जनकजा  सीताक  जे छल मातृभाषा ।
महाकवि विद्यापतिक जे कीर्त्ति – गाथा ।
मेघनादक  फाँस  मे  से  छह अचेतन,
आनि संजीवनि तोँ “शशि” तकरा जियाबह ।। मोन कहइछ ..........



गाबि  थाकल  जकर  महिमा,
शास्त्र  वेद  पुराण  अगनित ।
आइ तकरा  नञि भेटल अछि,
हा !  अपन पहिचान समुचित ।
आइ लागल छह ग्रहण  मिथिलाक रवि केँ,
एहेन  दुर्गति पर  ने तोँ  डम्फा बजाबह ।। मोन कहइछ ..........




डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”                                
विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ५१ , अंक ‍१०२ , ‍१५ मार्च २०१२ मे “स्तम्भ ३॰७” मे प्रकाशित ।

पद्य - ५३ - होरी नञि, होरीक प्रात रहए

 
होरी नञि, होरीक प्रात रहए




पर अधर  हुनिक  रक्तिम – रक्तिम,
ओ  गाल   गुलाबी – लाल  रहए ।




आइ गेल छलहुँ, हुनिका ओहि ठाँ,
होरी  नञि,  होरीक  प्रात  रहए ।
काजक  तऽ  सिर्फ  बहाना  छल,
छवि - दर्शन केर अभिलाष रहए ।।



सोझाँ अएलीहि, किछु बात बनल ।
बढ़ि  गेल जेना,  मोनक हलचल ।
अति आनन्दित  मुखमण्डल  छल,
आनन्दहि   बिह्वल   गात  रहए ।
आइ गेल छलहुँ, हुनिका ओहि ठाँ,
होरी  नञि,  होरीक  प्रात  रहए ।।



नयन  मिलल, पर थिर ने रहल ।
लाजेँ ने अधर किछु बाजि सकल ।
की  भेल ? - हमहु  स्तब्ध  रही,
मिलनक  अजगुत  एहसास रहए ।
आइ गेल छलहुँ, हुनिका ओहि ठाँ,
होरी  नञि,  होरीक  प्रात  रहए ।।



नहि रंग - अबीर - गुलाल चलल ।
नहि नयनहि केर  ब्यापार चलल ।
पर अधर  हुनिक  रक्तिम – रक्तिम,
ओ  गाल   गुलाबी – लाल  रहए ।
आइ गेल छलहुँ, हुनिका ओहि ठाँ,
होरी  नञि,  होरीक  प्रात  रहए ।।




डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”                                
विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ५१ , अंक ‍१०२ , ‍१५ मार्च २०१२ मे “स्तम्भ ३॰७” मे प्रकाशित ।


पद्य - ५२ - हमरा जुनि करिहेँ याद सखी


हमरा जुनि करिहेँ याद सखी





हमरा  जुनि  करिहेँ  याद  सखी 




हमरा  जुनि  करिहेँ  याद  सखी,
हम तऽ किछु  कालक संगी छी ।
जीवनक  जँ  राह  अनन्त  कही,
हम क्षण भरि केर बस संगी छी ।।


आइ एहि आङ्गन, आइ ओहि आङ्गन ।
हम  एहि  कानन  सँ  ओहि  कानन ।
नञि अता – पता हम्मर किछुओ,
हम  मुक्त गगन  केर पंछी छी ।
हमरा  जुनि  करिहेँ  याद  सखी,
हम तऽ किछु  कालक संगी छी ।।


जिनगी  मे  बहुतहु  भेंट  होयत ।
बहुतो  संगी  सभ  छुटि  जायत ।
एक जायत  तऽ  दोसर  आओत,
अछि  जीवन  तऽ  बहुरंगी  ई ।
हमरा  जुनि  करिहेँ  याद  सखी,
हम तऽ किछु  कालक संगी छी ।।


एक क्षण जञो हो मधुमय बसन्त ।
दोसर  सम्भव  पतझड़ - हेमन्त ।
थिक  समय-समय केर  फेर सखी,
हम मित्र,  बनल  प्रतिद्वन्दी छी ।
हमरा  जुनि  करिहेँ  याद  सखी,
हम तऽ किछु  कालक संगी छी ।।





डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”                                

विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ५१ , अंक ‍१०२ , ‍१५ मार्च २०१२ मे “स्तम्भ ३॰७” मे प्रकाशित ।

पद्य - ५‍१ - लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत


लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत




लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत ।
मुदा हम छी अहीं केर, अहीं केर रहब ।।




लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत ।
मुदा हम छी अहीं केर, अहीं केर रहब ।।



नाम अहीं केर जपै छी, हम आठो पहर ।
ध्यान अहीं केर रहैछ, नञि केओ दोसर ।
अहाँ मानू  ई सत्य, हम अहीं केर रहब ।
लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत ।।



साओन–भादो केर राति वा हो चैती बसन्त ।
जेठ हो कि अषाढ़ , वा हो ठिठुरल हेमन्त ।
हाबा बहितहि रहैछ, हाबा बहितहि रहत ।
लोक एहिना कहैछ, लोक एहिना कहत ।।



नञि कहियो मिझाइछ, प्रेम थिक ओ अनल ।
जरि अमृत भऽ जाइछ, वासना  केर  गरल ।
अहाँ अन्तऽहि सही, मन अहीं केर रहत ।
लोक एहिना कहैछ,  लोक एहिना कहत ।।







डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”                                
विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ५१ , अंक ‍१०२ , ‍१५ मार्च २०१२ मे “स्तम्भ ३॰७” मे प्रकाशित ।


Thursday, 8 March 2012

मिथिला = विदेह = वज्जि / बज्जि महासंघ = तिरहुत = तिरभुक्ति = तिरहुत ................................................. किए / कोना ??????






की थिक मिथिला ???

....................के छथि मैथिल ???





"दरभंगा प्राचीर" केर एक गोट भाग जकरा "यूरोपिय गेस्ट हाउस" कहल जाइत अछि - मिथिलाक नञि अपितु विश्व धरोहरि होयबाक योग्यता रखैछ । स्मारक थिक मिथिलाक गौरवशाली इतिहासक ।


       
की थिक मिथिला के छथि मैथिल ? हम कहैत छी ओरहि सँ ।
मिथिलावासी   सुनह   पिहानी,    हम   कहैत  छी   तोरहि   सँ ।।
                                                    - श्री रविन्द्रनाथ ठाकुर


राजनगर (मधुबनी) स्थित "नौलक्खा महल" केर भग्नावशेष, जे कि ‍१९३४ ई॰ आ बाद मे ‍१९८८ ई॰ केर भूकम्प मे क्षतिग्रस्त भेल । पर तइयो ई मिथिलाक गौरवशाली अतीतक साक्षी अछि । क्षतिग्रस्तहु भेला पर ई पर्यटनक एक गोट महत्त्वपुर्ण स्थल भऽ सकैत अछि ।



              वास्तव मे की थिक मिथिला आ के छथि मैथिल - ई प्रश्न हर मिथिलावासी अपना आप सँ पूछि रहल छथि आ अथक प्रयासक बादो सोझ – सोझ उतारा नहि भेटि रहल छन्हि । एहि सोझ प्रश्नक बहुत सोझ उत्तर थिक जकरा किछु “अज्ञात मिथिला विरोधी शक्ति” सभ ओझड़ी लगा देने अछि आ ओझड़ी तेना ने लटपटायल अछि जे एहि मकरजाल सँ निकलबाक प्रयास मे मैथिल लोकनि स्वयं आओरो ओझड़ायले जा रहल छथि । एहि अत्यन्त सोझ प्रश्नक बहुतहि सोझ सन उत्तर रखबाक प्रयत्न हम आइ एहि ठाम कऽ रहल छी ।

            पुराण सभ मे वर्णित राजा मनुक पौत्र, इक्ष्वाकु वंशी “निमि” अयोध्या सँ आगाँ बढ़ि शालिग्रामी (गण्डक) नदी केँ टपि कऽ एक टा राज्यक स्थापना कयलन्हि जकर राजधानी “जयन्तपुर” छल । इएह “निमि” किछु कारणवश (एकर कारण पर प्रकाश देनिहार कम सँ कम ३ टा कथा पुराणादि मे वर्णित अछि) “विदेह” कहओलन्हि आ आगाँ हिनकर उत्तराधिकारी सभ केँ सेहो “विदेह” वा “वैदेह” (विदेहक वंशज) कहि कऽ सम्बोधित कयल गेल । राजा केँ पिता सदृश मानबाक कारणेँ वा पिता समान राज्यक देखभाल करबाक कारणेँ हिनका “जनक” उपाधि सेहो देल गेल – जे कि बादक सभ विदेहवंशी राजा लोकनिक उपाधि वा पर्याय बनल रहल । एहि प्रकारेँ “निमि जनक” सेहो हिनकहि नाम छल । हिनकहि वर्णन शतपथ ब्रह्मण मे “विदेघमाथव” नाम सँ भेटैछ कारण दुनु गोटे एक्कहि भू – भाग पर राज करैत छलाह आ दुनु गोटेक पुरोहित “ब्रह्मर्षि गौतम” छलथिन्ह । हिनकहि नाम पर एहि राज्यक नाँव “विदेह” पड़ल




"श्री जानकी मन्दिर" (सम्प्रति नेपाल मे) - मिथिलाक गौरवशाली अतीतक स्मरण करबैछ । याद दियाबैछ जनक राजवंशक - जतए सँ मिथिलाक  इतिहास प्रारम्भ होइछ । वर्णित अछि कि मिथिलाक भूमि दलदल होयबाक कारणेँ रहबाक योग्य नञि छल आ तेँ जंगल केँ काटि आ अनेकानेक यज्ञ कए "निमि जनक" एहि भूमि केँ रहबा योग्य बनओलन्हि । एखनहु गण्डक, कोशी (कोसी) आ एहि नदी सभक अगनित धार एहि बातक पुष्टि करैछ ।


                   बाद मे “निमि जनक” केर पुत्र “मिथि जनक” विदेह साम्रज्यक राजा भेलाह आ विदेहक राजधानी वा अन्तःपुर केर नाम जयन्तपुर सँ बदलि कऽ हुनिकहि नाम पर “मिथिलापुरी” या “मिथिला नगरी” पड़ि गेल । बाद मे “मिथिला” केर अर्थ प्रसार भेल आ ओ विदेहक पर्याय बनि समस्त "विदेह" साम्राज्यक द्योतक बनल । एहि प्रकारेँ “विदेह” राज्यक दोसर नाम “मिथिला” भेल अन्तःपुर केर नाँव  “मिथिलापुरी” या “मिथिला नगरी” सँ बदलि कऽ “जनकपुर” या “जनकपुरी” भऽ गेल । ई घटना गवाह थिक जे प्रजाक बीच मिथि जनक अपन पिता निमि जनक सँ बेशी प्रतिष्ठित भेलाह ।

                    “निमि जनक” व जनक राजवंशक सभ राजा लोकनि प्रकाण्ड विद्वान रहथि – मात्र धर्मशास्त्रे नहि अपितु ओहि समयक अन्यान्य सभ विधाक । आयुर्वेदक आठ अंग मे सँ एक अंग “शालाक्य तन्त्र” कहबैछ, जाहि मे उर्ध्वजत्रुगत अंग (Supra clavicular organs = ears, eyes, nose, throat, brain & teeth = modern ENT + Opthalmology + Dentistry + Encephalon) सभक चिकित्सा व शस्त्रकर्म अबैत अछि । निमि जनक आयुर्वेदक एहि शाखा केर प्रणेता वा जनक (Father Of The SHĀLĀKYA TANTRA) मानल जाइत छथि ।  एहि विषय पर हुनक लिखित ग्रण्थ “वैद्यसन्देहभञ्जन” एखन अप्राप्य अछि पर सुश्रुत संहिता आदि आयुर्वेदक ग्रण्थ सभ मे ओहि ग्रण्थक संदर्भित अंश सभ भेटैछ ( ई सन्दर्भ सभ एहि बातक प्रमाण थिक कि "जनक" कोनो मिथक वा महाकाव्यक काल्पनिक पात्र नञि छलाह । मिथिलाक अस्तित्व  केँ मात्र बौद्ध साहित्य मे वर्णित महाजनपद सभक काल सँ मानचित्र पर देखायब आ ओहि सँ पहिने नञि देखायब सरासर बदमाशी थिक ) । बाद मे “कराल जनक” धरि ई परम्परा चलैत रहल आ कराल जनकक किछु विचार वैभिन्यक चर्च सेहो सुश्रुत संहिता आदि मे भेटैत अछि ।


श्री जानकी (सीता / सिया / वैदेही) जन्मभूमि - उर्विजा कुण्ड - सीतामढ़ी । जतए हऽर चलओला पर धरती सँ "सीता" नामक रत्न बहार भेलीह ।


          जनक राजवंशक आन प्रमुख वा उल्लेखनिय राजा रहथि “सिरध्वज जनक” (सीताजी आ माण्डवीजीक पिता), “कुशध्वज जनक” ( सीताजीक पित्ती आ उर्मिलाजी आ श्रुतिकिर्त्तिजीक पिता, ओ राजा नञि रहथि), “कृति जनक”, “कीर्त्ति जनक”, “बहुलाश्व जनक” (महाभारतक समयक) आ “कराल जनक” । “कराल जनक” केर विचारधारा पुर्ववर्ती जनक लोकनि सँ साम्य नञि रखैत छल तेँ प्रायः हुनक नामक संग शास्त्र सभ मे जनक प्रत्यय / उपाधि नहि भेटैछ – सिर्फ “कराल” नामोल्लेख भेटैछ । ओ अपन कुकृत्यक कारणेँ राज्यच्युत आ  निर्वासित भेलाह ।


                जनक राजवंशक समाप्तिक बाद “मिथिला” बहुतहि छोट – छोट इकाई सभ मे बँटि गेल – एहि मे सँ हरेक भाग स्थानीय जनसमूह द्वारा चुनल गेल “गण” (स्थानीय निर्वाचित राजा)  द्वारा शाशित छल – एहि प्रकारक व्यवस्था “गणतन्त्र” कहल गेल । ई विश्व पटल पर अपना तरहक प्रजातण्त्र / जनतन्त्र / गणतन्त्र केर  पहिल व्यवस्था छलयद्यपि ई विभाजित भू – भाग वा इकाई सभ अलग – अलग गण वा स्थानीय राजा सभ सँ शाशित छल तथापि “मगध” सँ चलि रहल शीतयुद्धक कारणैँ सैन्य व सामरिक स्तर पर एकजुट छल (ठीक ओहिना जेना कि पहिनुका सोवियत संघ छल वा एखन संयुक्त राज्य अमेरिका वा भारतिय गणतन्त्र संघ वा यूरोपिय संघ अछि) । एहि प्रकारेँ मिथिला वा विदेह राज्यक स्थान एक संघ वा महासंघ लऽ लेलक, जकर नाम राखल गेल “वज्जि महासंघ / बज्जि महासंघ / बज्जि महाजनपद / वज्जि महाजनपद” । तेँ एहि प्रकारेँ "वज्जि वा बज्जि" विदेह वा मिथिला केर पर्यायी नाँव भेल, परस्पर पृथक राज्य नञि



"वैशाली" स्थित "विश्व शान्ति स्तूप" जे कि "अजातशत्रु" द्वारा शीतयुद्ध मे भेल पराजयक परिचायक छी । 



         बज्जि महासंघ मूलतः मिथिला केर विखण्डन सँ बनल “मैथिल लघु राज्य” वा "मैथिल लघु जनपद" सभक सामुहिक संघ छल जाहि मे नेपालक एक – आध टा “अमैथिल लघु राज्य” सभ सेहो सम्मिलित भेल । 



"वैशाली" स्थित "अशोक स्तम्भ" आ बौद्ध स्तूपक भग्नावशेष जे कि अजातशत्रु केर बाद अशोक धरिक आधिपत्यक याद दियाबैछ । वैशाली पर भलहि किछु समय धरि मगधक अधिकार रहल हो परञ्च ओहि सँ पहिने मूल रूपेण ओ "विदेह / मिथिला" केर भाग छल आ तकर बादहु मिथिलहि केर भाग रहल आ एखनहु अछि ।



               “वैशाली” मिथिलाक विखण्डन सँ बनल उपरोक्त “मैथिल लघु राज्य” सभ मे सँ एक छल । ओहि समय मे लुम्बिनी वा लिच्छवी (नेपाल) सँ वैशाली धरि एक गोट राजमार्ग छल जे बीच मे कुशीनगर आ श्रावस्ती सँ होइत जाइत छल । चुकि “महात्मा बुद्ध” एहि राजमार्ग सँ बहुधा आबैत – जाइत छलाह तेँ तत्कालीन बौद्ध साहित्य मे बज्जि महाजनपदक आन घटक राज्य सभक उल्लेख नञि भेटैछ जखन कि एहि जनपद सँ वैशालीक उल्लेख पर्याप्त रूपेण भेटैछ । ओहुना बज्जि महाजनपदक प्राचीन शहर "जनकपुर" तऽ पहिनहि सँ अपन वैभवक लेल विश्वविख्यात छल पर बज्जि महाजनपदक समय वैशाली नऽव शहर छल जे वैभव परिपुर्ण भेल, आ नऽव वस्तुक चर्च स्वभाविकहि तेँ वैशालीक विशेष उल्लेख । एकर अतिरिक्त, वैशाली मगध सँ बज्जि महासंघ मे प्रवेश करबाक द्वारि छल । एतहि सँ अजातशत्रु – शीतयुद्ध मे जयचन्दक भूमिका मे ठाढ़ि आम्रपाली द्वारा – अभेद्य बज्जि महासंघ मे प्रवेश पओलक । तत्कालीन साहित्य मे वैशालीक विशेष चर्चा होयबाक ईहो एक टा मुख्य कारण थिक । (बहुधा इतिहासदर्शक मानचित्र इएह महाजनपदकालीन "विदेह" केँ "मिथिला वा विदेह" रूप मे चित्रित करैत अछि, जे कि अत्यन्त भ्रामक थिक आ निन्दनिय थिक । बज्जि महासंघक समय मे एहि महाजनपदक मध्यवर्ती भाग "विदेह" कहबैत छल पर ई सम्पुर्ण "विदेह वा मिथिला" केर द्योतक नञि । एहि समय केर सन्दर्भ  देखा कऽ ई भ्रम उत्पन्न कएल जाइत अछि कि "वैशाली" आ "मिथिला" हमेशा सँ अलग क्षेत्रक परिचायक थिक - जे कि सर्वथा अनुचित, निन्दनिय आ अग्राह्य थिक । बज्जि महासंघक सभय मे छोट - छोट हरेक इकाई (गण) केँ किछु ने किछु नाम देल गेल छल, जाहि मे विदेह आ वैशाली अलग अलग क्षेत्र / इकाई / गण केर नाम छल । पर इतिहास मे आओरो पाछाँ गेला पर, जनक राजवंशक समय मे, ज्ञात होइछ कि "विदेह" वा "मिथिला" "वैशाली सहित" तथाकथित सम्पुर्ण भू - भाग केँ निरूपित करैछ । तेँ मानचित्र मे "विदेह" नाम सँ "वैशाली रहित" क्षेत्रक निरूपण अग्राह्य व भ्रामक थिक ।

           “हर्षवर्धन”  केर समकालीन वा किछु पुर्ववर्ती आ परवर्ती समय मे राज्यक केँ “भुक्ति” कहल जाइत छल । एहि समय मे मिथिला प्रदेश केँ “तीरभुक्ति” कहल जाइत छल । तीरभुक्तिक अर्थ अछि ओ भुक्ति / राज्य जे नदीतट सँ घेड़ल हो – आ सर्वविदित अछि कि मिथिला तीन कात सँ नदी सँ घेड़ायल अछि – पूब दिशि कोशी (कोसी) व सहयोगी नदी (tributaries) सभ, पच्छिम दिशि गण्डक (शालिग्रामी) व ओकर सहयोगी सदी (tributaries) सभ तथा दक्षिण दिशि गंगा नदी । “तीरभुक्ति” तत्सम् शब्द थिक, जकर तद्भव स्वरूप “तिरहुत” भेल ।


मैथिली सम्प्रति "देवनागरी" लीपि मे लिखल जाइत अछि । पर एकर मूल लीपि थिक "मिथिलाक्षर / तिरहुता / वैदेही लीपि" । 

एहि लिपिक नाँव सभ स्वयम् साक्ष्य थिक कि विदेह, मिथिला आ तिरहुत पर्यायी नाँव थिक ।

बाङ्गला आ असमिया लीपि वस्तुतः मिथिलाक्षरहि सँ निकलल अछि । उड़िया सेहो मिथिलाक्षरहि सँ निकलल पर पाल राजवंश आदिक शासनकाल मे ओहि पर द्रविड़ समूहक भाषा सभक प्रभाव परबाक कारणेँ ओ मिथिलाक्षर आ बाङ्गला सँ किछु परिप्रेक्ष्य मे अलग भऽ गेल । मणिपुरी सम्भवतः असमिया सँ निकलल अछि जे कि मूल रूपेँ मिथिलाक्षरहि सँ उत्पन्न थिक ।

मैथिलीक किछु पाण्डुलिपि "कैथी लीपि" मे सेहो अछि, पर ई लीपि मैथिलीक सम्भवतः मूल लिपि नञि थिक, ई विशेषतः व्यापारी वर्ग द्वारा जानकारी केँ जन - सामान्य सँ गुप्त रखबाक लेल प्रयोग होइत छल । बाद मे एहि लिपि केँ प्रयोक्ता लोकनि अप्पन सुविधाक कारणेँ, एहि लिपि मे किछु महत्तवपुर्ण रचना सभ सेहो कएलन्हि आ किछु अभिलेखादि सेहो लिखल गेल । 


            एहि प्रकारेँ, मिथिला, विदेह, बज्जि / वज्जि, तीरभुक्ति आ तिरहुत – ई पाँचो नाँव एक्कहि भू भागक परिचायक थिक आ परस्पर पर्यायवाची थिक । एहि पाँचो नाँव मे ओतबहि समानता वा भिन्नता अछि जतेक कि आर्यावर्त, भारत, हिन्दोस्ताँ, हिन्दुस्तान व इण्डिया मे थिक । . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .  आओर एहि तरहेँ जँ मिथिला, विदेह, बज्जि / वज्जि, तीरभुक्ति आ तिरहुत पर्यायवाची भऽ एक्कहि भू – भाग / क्षेत्र  / प्रदेश  केँ निरूपित करैछ, तऽ मैथिली, बज्जिका, वज्जिका आ तिरहुतिया अलग – अलग भाषा कोना भऽ गेल ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? वास्तव मे ई चारू नाँव एक्कहि भाषा केर पर्यायी नाँव थिक आ ओ भाषा अछि “मिथिला – भाषा” वा “मैथिली”



पाल राजवंशक समय मे निर्मित विश्वप्रशिद्ध "विक्रमशिला विश्वविद्यालय" केर भग्नावशेष (सम्प्रति भागलपुर जिला मे अवस्थित) ।



               “अंग प्रदेश / चम्पा  ऐतिहासिक रूपेँ कहियो मिथिला मे समेकित छल वा नहि तकर वर्णन नहि भेटैछ । महाभारत काल मे कौरवक उपनिवेशक रूप मे एकर चर्च भेटैत अछि जकरा दुर्योधन “दानवीर कर्ण” केँ दान स्वरूप मे देलक आ तहिया सँ कर्ण “अंगराज कर्ण” कहओलाह । जानकारी भेटैत अछि कि समकालीन मिथिला मे जनक राजवंश स्थापित छल जकर राजा “बहुलाश्व जनक” छलाह आ मिथिला व हस्तिनापुर केर बीच मैत्री सम्बन्ध छल तेँ ओ पहिने पाण्डु (पाण्डव नहि) तथा बाद मे कौरवक संग युद्ध कयने छलाह । एहि मैत्री सम्बन्धक करणेँ, कौरवक उपनिवेश रहितहुँ सम्भवतः अंग आ मिथिला मे मैत्री सम्बन्ध रहल होयत – आ तेँ सांस्कृतिक व भाषायी समानता रहल होयत । “पाल राजवंशक” शाशनकाल मे एहि ठाम विश्वविख्यात “विक्रमशिला विश्वविद्यालय” केर निर्माण भेल । यद्यपि भौगोलिक स्थितिक कारण बीच - बीच मे मगध सँ सेहो कमोबेश प्रभावित होइत रहल तथापि मिथिला सँ एहि प्रदेशक सांस्कृतिक व भाषायी साम्य बनल रहल । “चौरचन / चौठचन्द्र”“सामा – चकेबा” मिथिलाक विशिष्ट पावनि थिक जे भारत मे आओर कतहु नञि मनाओल जाइत अछि पर तथाकथित अंग – प्रदेश मे मिथिले जेकाँ मनाओल जाइत अछि




"सामा - चकेबा" नामक ई पावनि मात्र मिथिला वा मैथिल संस्कृतिक विशेषता थिक । तहिना "चौरचन (चौठ - चन्द्र)"  पावनि सेहो ।


                  किछु लोक एहि प्रदेशक भाषा अंगिका केँ अलग भाषा (Separate language) मानैत छथि तऽ किछु लोक हिन्दीक बोली (Dialect of Hindi) । जँ अंगिका बोली थिक तऽ ओ हिन्दीक बोली कथमपि नञि – ओ मैथिलीक बोली भऽ सकैत अछि, हिन्दीक बोली होयबाक तऽ कोनो आधारहि नञि थिक । प्रशिद्ध भाषाविद् स्व॰ सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्शन अंगिकाक वर्णन छिका – छिकी नामक मैथिलीक बोलीक (Dialect of Maithili) रूप मे कयलन्हि अछि । मात्र एहि प्रकारक ऐतिहासिक अस्थिर सीमारेखा मिथिला आ अंग प्रदेश मे अलग – अलग भाषा होयबाक आधार नहि भऽ सकैछ । जँ से रहैत तऽ आधुनिक महराष्ट्र मे कम सँ कम चारि अलग – अलग भाषा रहैत कारण विदर्भ, खानदेश, मराठवाड़ा आ पच्छिमी महाराष्ट्र इतिहास मे कहियो अलग – अलग सेहो रहल अछि । तेँ भारतक उपरोक्त प्रदेश (मिथिला आ अंग)  ओ नेपालक मिथिला केर भाषा एक्कहि थिक “मिथिला – भाषा” वा “मैथिली”

                     वास्तव मे अंग्रेजी शासनकाल मे (सन् 1875 ई॰ मे) “बाँटू आ राज करू नीति” (Divide & Rule Policy) केर अनुसारेँ सम्पुर्ण “तिरहुत / मिथिला” प्रदेश केँ गलत ढंग सँ दू भाग मे बाँटल गेल, जकर नाँव पड़ल – मुजफ्फरपुर डीविजनदरभंगा (दड़िभंगा) डीविजन । ओहि समयक दरभंगा (दड़िभंगा) डीविजन मे आधुनिक दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, बेगूसराय पुर्णिञा आ  पुबरिया मिथिलाक शेष सभ जिला अबैत छल । ओहिना मुजफ्फरपुर डीविजन मे आधुनिक मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, वैशाली, शिवहर, पुबारी आ पछबारी चम्पारण अर्थात् पछबरिया मिथिला आबैत छल । मुजफ्फरपुर डीविजन मे भोजपुरी भाषी आधुनिक तीन जिला सीवान, सारण (छपरा) आ गोपालगंज सेहो राखल गेल । एतहि सँ मिथिला आ मैथिली केर प्रति भ्रम आ मिथिला – मैथिली केर क्षेत्रक अतिक्रमणक प्रयास शुरू भेल ।

               एहि समय मे अंग्रेज नीति निर्माता लोकनि मिथिला आ मैथिली केँ तोड़बाक – फोड़बाक बीया रोपलन्हि । दुष्प्रचार कयल गेल कि दरभंगा (दड़िभंगा) डीविजन केर लोक सभ “मैथिली” बजैत छथि आ मुजफ्फरपुर डीविजन केर लोक सभ “तिरहुतिया / बज्जिका” बजैत छथि । बाद मे एहि अनुसारेँ मुजफ्फरपुर डीविजन केर नाँव तिरहुत डीविजन राखि देल गेल । जे तिरहुत आ बज्जि, मिथिला केर पर्यायी नाँव छल तकरा मिथिला केर प्रतिद्वंदी नाँव बना देल गेल आ नव भाषा तिरहुतिया गढ़ि देल गेल । बाद मे, भारतक आजादी केर समय आ आजादी केर बाद तिरहुतिया नामक भाषा केर असरि समाप्त होइत देखि एकरहि एक नऽव नाँव गढ़ल गेल बज्जिका / वज्जिका – जे बज्जि वा वज्जि समस्त मिथिलाक परिचायक छल ओकरा जबरदस्ती केवल वैशाली आ लिच्छवी धरि सीमित कऽ देल गेल ।




सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्शन । आयरिश भाषाविद् । जन्म - ०७ जनवरी ‍१८५‍१ ई॰ ।  मृत्यु - ०९ मार्च ‍१९४‍१ ई॰ । भारतक भाषा सर्वेक्षणक महान कृति (‍१८९८ ई॰ सञो ‍१९२८ ई॰ धरि), कुल ३६४ भाषा आ बोलीक जानकारी, निश्पक्षतापुर्ण सर्वेक्षण ।  एकर अतिरिक्त "क्रिस्टोमैथी ऑफ मैथिली" आ "पीजेण्ट लाइफ ऑफ बिहार" नामक महत्त्वपुर्ण रचना । मधुबनी मे बहुत दिन धरि पदस्थापित, "गिलेशन बजार" हिनकहि नाम पर अछि ।


                    एहि सभ उठा – पटक केर बीच एक गोट उदार तटस्थ विद्वान भाषाविद् “सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन” केर आगमन आ कार्य – कलाप भारत मे भेल । ओ अपन महान काज “भारतक भाषा सर्वेक्षण” पूरा कयलन्हि आ मैथिली केँ एकटा स्वतन्त्र, सजीव भाषाक रूप मे प्रतिष्ठित कयलन्हि, जकर की बहुतहि बोली अछि । यद्यपि प्रारम्भ मे ओहो थोड़ेक भ्रमित भेलाह आ मैथिली केँ "बिहारी" नामक भाषाक एकटा बोली मानि बैसलाह । पर जल्दिअहि हुनिका बुझि पड़लन्हि कि मैथिली केँ बिहारी केर अन्तर्गत एकटा बोली मात्र मानक भयंकर गलती थिक ।  ओ  बंगाली, उड़िया आ असमिया भाषाक सर्वेक्षणक भूमिका मे अपन एहि गलती केँ मानलन्हि आ मैथिली केँ स्वतन्त्र, सजीव भाषा स्वीकार कएलन्हि । बाद मे ओ बहुत दिन धरि मधुबनी जिला मे कार्यरत छलाह (आधुनिक गिलेशन बजार हुनिकहि नाम पर अछि) आ मैथिली केर व्याकरण विषयक अध्ययन आ लेखन सेहो कएलाह । सर ग्रियर्सन मैथिली केँ तत्कालीन बिहारक राजभाषा केर रूप मे अनुमोदित कएने छलाह । परन्तु ओहि समय स्वतन्त्रता संग्रामक समय छल आ  सर ग्रियर्सन एहि प्रस्ताव केँ गलत रूप मे देखल गेल । मैथिल लोकनि सेहो देशहित मे एहि पर जोर नहि देलन्हि आ हिन्दीअहि केँ राजभाषा स्वीकार कएलन्हि – मोन मे आश रहन्हि कि देश स्वतन्त्र भेलाक बाद पुनः मैथिलीक स्थान लेल बात कयल जायत । आ से कोनो बेजाए विचार नहि छल (सन्दर्भ देखू -  http://www.lisindia.net/Maithili/Maith_lang.html )

                           देश स्वतन्त्र भेल, भाषायी आधार पर राज्य बनाओल गेल पर दुर्भाग्यवश मिथिला केर कोनहु चर्च नहि । एतबहि नहि मैथिल केँ परस्पर लड़एबाक आ मैथिली केँ क्षिन्न – भिन्न कए नामो – निशान मेटएबाक व्यवस्था कएल गेल । मिथिला रज्य के कहइए, मैथिली केँ नहिञे साहित्य अकादमी मे स्थान देल गेल आ नहिञे आठम अनुसुची मे । मैथिली केँ जबरदस्ती हिन्दीक बोली केर रूप मे घोषित करबाक असफल परन्तु जीतोड़ प्रयास भेल । अंग्रेज नीतिज्ञ लोकनिक रोपल मिथिला आ मैथिलीक विखण्डन ओ विभाजनक बीया सुखायल नहि । भारतक स्वतन्त्रताक बाद किछु
“अज्ञात शक्ति” सभ ओकरा आओरहु सिञ्चित कऽ – पानि आ खाद दऽ कऽ - गाछ बनयबाक प्रयास कयलन्हि । दरभंगा, तिरहुत आ भागलपुर आदि कमिश्नरी बनाओल गेल आ मैथिल लोकनि केँ भ्रमित कयल गेल कि मैथिली दरभंगा  कमिश्नरीक लोकक भाषा थिक जखन कि तिरहुतिया / बज्जिका तथा अंगिका क्रमशः तिरहुत आ भागलपुर कमिश्नरी केर भाषा थिक । मिथिलाक पर्यायी नाँव तिरहुत केँ जबरदस्ती मात्र किछुए जिला धरि सीमित करबाक दुष्प्रयास कयल गेल ।


                       एहि प्रकारक “अज्ञात शक्ति” सभ सँ पूछए चाहैत छिअन्हि कि जँ अंग आ मिथिलाक भाषा सिर्फ एहि द्वारे एक नञि भऽ सकैत अछि कि इतिहास मे ओ पृथक राज्य छल तऽ फेर बिहारक भोजपुर मॉरिशस केर बोली एक होयबाक दावा कोन आधार पर ? जँ दरभंगा, चम्पारण, वैशाली, मुजफ्फरपुर, खगड़िया, पुर्णिञा, बेगूसराय, भागलपुर, मुँगेर आदि स्थानक बोली मे थोड़ेक भिन्नता अछि तऽ ताहि सँ की ? ई भिन्नता तऽ कोनहु सजीव आ विस्तृत भाषा सभक बोली मे देखल जाइछ चाहे ओ हिन्दी हो, मराठी हो अंग्रेजी हो वा आन कोनहु भाषा हो । एहि सँ बेशी भिन्नता आरा, सासाराम, छपरा सीवान आ बलिया आदि स्थानक बोली मे थिक । जाहि आधार पर मैथिली, अंगिका आ बज्जिका केँ अलग - अलग भाषा देखएबाक प्रयास भऽ रहल अछि ताहि आधार पर भोजपुरी, छपपरिया, जौनपुरी, आ बनारसी आदि अलग अलग भाषा भेल । परञ्च जँ ओ सभ अलग – अलग भाषा नञि कहबैछ तऽ फेर मैथिली केर लेल एहि प्रकारक कसरत किएक ? ? ? ? ? ?  किछु लोक "मैथिली कोकिल, महाकवि विद्यापति" केँ सेहो बरजोरी हिन्दी कविक लेबल लगएबाक प्रयास कऽ रहल छथि (यथा सन्दर्भ देखू -  http://www.brandbihar.com/hindi/literature/kavya/vidyapati.html ) । 



मैथिली कोकिल, अभिनव जयदेव, महाकवि "विद्यापति" । पुर्ण नाँव - "स्व॰ विद्यापति ठाकुर । अनुमानित काल - ‍१३४० सञो ‍१४३० ई॰ (महाराह शिवसिंह केर समकालीन)  । जन्म स्थान - बिस्फी (बिसफी) , मधुबनी । तत्कालीन पाण्डित्यक भाषा छाड़ि , जनभाषा "मैथिली" मे पदावली रचना । हिनकहि सँ प्रेरित भए गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) "भानुसिंहेर पदावली" नाम सँ अपन प्रारम्भिक रचना कएलन्हि । हर तरहक मैथिली मे (मैथिलीक बोली सभ मे) महाकवि विद्यापति अपन रचना कएलन्हि । 


                 बहुत संघर्षक बाद 1956  ई॰ कऽ मैथिली साहित्य अकादमी मे स्थान पओलक आ 2004 ई॰ मे आठम अनुसुची मे सुचीबद्ध भेल । पर किछु लोक सभ केँ ई गप्प पचि नञि रहल छन्हि ।  मैथिल केँ आ विश्व समुदाय केँ मिथिला आ मैथिलीक प्रति भ्रमित करबाक ई प्रक्रिया एखनहु पूरा जोर – शोर सँ किछु “अज्ञात शक्ति” सभ द्वारा चलाओल जा रहल अछि ।  विकिपीडिया, वेबसाइट आ प्रिण्ट मीडिया पर सेहो भरपूर भ्रामक जानकारी छापल जा रहल अछि । एहि सन्दर्भ मे ऑउटलुक इण्डिया द्वारा कएल गेल सर्वेक्षण केर क्रम मे देल गेल प्रस्तावित मिथिला राज्यक मानचित्र सराहनीय अछि (सन्दर्भ देखू - http://www.outlookindia.com/article.aspx?279690 )

               हमरा जतबा बूझल छल से लिखल , बाकी अपने लोकनिक इच्छा – मानी अथवा नञि मानी । ई अपने लोकनिक इच्छा पर निर्भर करैछ कि सच बुझबाक वा जानबाक प्रयास करब या दिग्भ्रमित भऽ भोतिआएत रहब । हम ई नञि कहैत छी जे हमर बात मानू । पर समस्त मैथिल लोकनि सँ निवेदन जे स्वयम् सच – बात जानबाक प्रयास करू हमर वा ककरहु आनक बात पर सीधा विश्वास करबाक प्रयास नञि करू । अपने सुविज्ञ छी, विचारवान छी आ संगहि अपन मत मानबाक लेल स्वतन्त्र छी । अन्त मे हम एतबहि कहब जे

  आउ आइ हम सभ हिलि मिलि कऽ माँक उतारी आरती ।
  जय जय मिथिला, जयति मैथिली, जय भारत, जय भारती ।। 
                                    - श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर "अनिल"         




                                                       ।। अथ शुभम् ।।