Pages

मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Sunday, 25 September 2011

"वि दे ह" - प्रथम मैथिली पाक्षिक ई - पत्रिका मे प्रकाशित हमर किछु गीत व आन पद्य रचना, भाग - ‍२


( वि दे ह - प्रथम मैथिली पाक्षिक ई - पत्रिका ( ISSN 2229-547X VIDEHA), अंक -  ९‍१,९२  (१ आ ‍१५ अक्टूबर २०‍१‍१)  सँ साभार )




  सभ सँ रसगर माएक भाषा (गीत)
भ  सँ  रसगर  माएक  भाषा,
                           भाषा सँ मीठ  नञि हो मिसरी ।
करी ज्ञानार्जन पढ़ि बहुत विधा,
                          पर निज भाषा केँ जुनि बिसरी ।।


भाषा जे  पशु सँ  भिन्न केलक,
भावाभिव्यक्ति केर चिन्ह देलक ।
रटि  दोसर  बोली, बनि  सुग्गा,
                          अहँ ओहि भाषा केँ जुनि बिसरी ।
सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा,
                           भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।।


हो सारि  प्रिय,  सरहोजि  प्रिय,
पत्नी  केँ  राखी  सटा   हृदय ।
पर अछि अस्तित्व जनिक कारण,
                          अहँ ओहि माता केँ जुनि बिसरी ।
सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा,
                           भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।।


माएक  भाषा , अप्पन  भाषा ।
मिथिला – भाषा, अप्पन भाषा ।
परहेज  किए  एहि  भाषा सँ ?
                          आउ एहि पर हम सभ गर्व करी ।
सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा,
                           भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।।



विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४६, अंक ९१, ‍दिनांक - ०१ अक्टूबर २०११ मे प्रकाशित ।



  गे सजनी फोल कने फेर ठोर (गीत)


मल नयन लखि,
               मधुर वयन सुनि,
                              हुलसित मन ई चकोर ।
                                              गे सजनी फोल कने फेर ठोर ।।
       
हमरा  एते  तोँ जुनि तरसा गे ।
अपन अधर मधु रस बरिसा दे ।
                           जुनि बन तोँ एतेक कठोर ।
                      गे सजनी फोल कने फेर ठोर ।।

बोल - सुबोल  हृदय  उद्‌बेधल ।
तोहर सरिस दोसर नञि देखल ।
                          उर – अन्तर उठय हिलोर ।
                     गे सजनी फोल कने फेर ठोर ।।

कोयली जदपि सातहु सुर सीखल ।
तदपि सखी , तोहरा नहि जीतल ।
                            मधु भरल छौ पोरे पोर ।
                     गे सजनी फोल कने फेर ठोर ।।





विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४६, अंक ९१, ‍दिनांक - ०१ अक्टूबर २०११ मे प्रकाशित ।



      हम नञि कहब कि ......... (गीत)

हम नञि कहब कि “सुष्मिता” सँ नीक छी  अहाँ,
“ऐश्वर्या”  केर   जेरॉक्स    प्रतीप   छी  अहाँ ।


हम  नञि कहब कि  फूल  मे गुलाब  छी  अहाँ,
हमर  जिनगी केर स्वप्न ओ “ताज”  छी  अहाँ ।
मुदा  जिनगीक  एकसरि  अन्हरिया मे  विकसित,
सुन्नर   ओ   सुमधुर   प्रभात   छी   अहाँ ।।

हम नञि कहब कि “सुष्मिता” सँ नीक छी  अहाँ,
“ऐश्वर्या”  केर   जेरॉक्स    प्रतीप   छी  अहाँ ।
अहाँ  नञि  चाही  हमरा,  ई   इच्छा   अहँक,
मुदा  अहीं  हमर  अन्तरा , ओ गीत छी अहाँ ।।

किछु   अन्यथा  ने    सोचब,  से  आग्रह  हमर,
एक  कवि  केर  दुस्साहस  केँ  कऽ  देब क्षमा ।
अहाँ    अँऽही    रहब,   हऽम    हमही   रहब,
अहँक   चाहत    रखबाक    हमर    हस्ती     कहाँ  !!




विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४६, अंक ९१, ‍दिनांक - ०१ अक्टूबर २०११ मे प्रकाशित ।

  
  धिया – पुता जनकक वंशज हम 
         (बालगीत)


लितहि रहब अछि काज हमर, लगातार अविराम ।
              जा धरि भेटय ने लक्ष्य जीवनक, चाही ने विश्राम ।।

प्रगतिक पथ पर बढ़ैत रहब हम, हरैत विघ्न - बाधा सभ केँ ।
चलितहि रहब जीवनक पथ पर, नाँघैत सरिता गिरि गह्वर केँ ।
सहैत चलब हम सुख – दुःख सभटा, कनिञो  नञि घबड़ायब ।
माए  मैथिलीक  आँचर  पर  नहि, कोनहु  कलंक  लगायब ।

कनक रेख सञो लिखब भारतक विश्व पटल पर नाँव ।
              जा धरि भेटय ने लक्ष्य जीवनक, चाही ने विश्राम ।।

चलैत  रहब  हम अडिग सुपथ पर, नव - नव लय जिज्ञासा ।
प्रेम – स्वतंत्रता - ज्ञानक   भूखल,  रत्नक  नञि  अभिलाषा ।
धिया – पुता जनकक वंशज हम, स्वर्णिम भविष्य केर  आशा ।
अथक  परिश्रम  काज हमर,  बिनु  स्वार्थक  कोनहु  पिपासा।

विश्व पटल पर फेर बनायब मिथिला केर नव पहिचान ।
             जा धरि भेटय ने लक्ष्य जीवनक, चाही ने विश्राम ।।




विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४६, अंक ९१, ‍दिनांक - ०१ अक्टूबर २०११ मे प्रकाशित ।


    
  बनि जयतहुँ हम बच्चा (गीत)



आइ  अनायस,  हमर  मोन  मे, सुन्नर  सनि  एक  इच्छा ।
            ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।।

सरस  बसन्तक अबितहि  भोरे,  बीछय जयतहुँ  टिकुला ।
बिनु  मजड़ल, आमक झाँखुड़ तर, टाँगि लगबितहुँ हिड़ला ।
दैत्यक  पहड़ा,  जेठ - दुपहरिया,  पर  लोभेँ  बम्बईय्या ।
बौअइतहुँ  गाछी – कलमेँ, पाबितहुँ  मालदह – कलकतिया ।
पाकल पीयर – लाल  बैड़ हम, जेबी भरि – भरि  अनितहुँ ।
लिच्ची जामुन आओर जिलेबी, किछु खयतहुँ, संग लबितहुँ ।
भूत – पड़ेतक डऽर तऽ, चलि  जयतय   पड़ाय  कलकत्ता ।
            ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।।

साओन मास - पहिल वर्खा , बम्मा  सँ खसइत झड़ – झड़ ।
जाय  नहयतहुँ, जेना  पहाड़क, कल - कल सुन्नर – निर्झर ।
सण्ठी  केँ  धुधुआय   बनबितहुँ,   सिगरेटक  हम  नाना ।
घूर  मे  दऽ  अधखिज्जू  आलू ,  तकर  बनबितहुँ  साना ।
चोड़ा – नुका,  निज माए – बाप सँ,  जयतहुँ  दौड़ल भोड़हा ।
कोमल - हरियर - कञ्च – बदाम, उखाड़ि  बनबितहुँ ओड़हा ।
फलना  केँ  रखबाड़  पकड़लक,  भेल  गाम  भरि  चर्चा ।
            ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।।

दुर्गापूजा – छठि - दिवाली,   पावनि   तीन   सहोदरि ।
मास दिवस इस्कूल दरस नञि, पावनि सम नञि दोसर ।
की भसान केर  छल उमंग,  की सुन्नर हुक्का – लोली ।
खेल  कबड्डी – किरकेट - गोली,  खेली  नुक्का – चोरी ।
चौठ – चन्द्र, मिथिलाक विशेषीकृत पावनि अति अनुपम ।
भाँति – भाँति पकवान देखि,  बढ़ि जाय  हृदय स्पन्दन ।
घण्टा – घण्टा बन्शी  पाथितहुँ,  रोहुक  आश  लगओने ।
रोहु – बोआरि ने, पोठी  दू टा,  अबितहुँ  हाथ डोलओने ।
बन्शी लऽ घुमितहुँ भरि दिन,  पोखड़ि – डाबर ओ खत्ता ।
            ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।।


 
विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४६, अंक ९२, ‍दिनांक - १५ अक्टूबर २०११ मे प्रकाशित ।



     
  आबहु मीता छोड़ू (गीत)


गोल – गोलैसी, पर – पञ्चैती ।
गप्प  अनेरोक,  कानाफुसकी ।
                         आबहु मीता छोड़ू ।
दुनिञा देखू दौड़ि रहल अछि, अपने घसड़ब छोड़ू ।
                 हे यौ , अपने घसड़ब छोड़ू ।।

कमजोरहा  पर  देखबी  धाही ।
पुस्त - पुस्त केर करी उखाही ।
बात – बात  पर लट्ठ - लठैती ।
घऽरे  फनफन,  बाहर   लाही ।
बड़ बुत्ता जँ, अहँक देह मे,  नूतन सर्जन कऽरू ।
               हे यौ ,  नूतन सर्जन कऽरू ।।

ओ केलन्हि, से नीक ने कएलन्हि ।
फलना जिनगी व्यर्थ गमओलन्हि ।
मुइलहा   सारा   कोरि  भर्त्सना ।
सकल  अकारथ   हुनक  सर्जना ।
आनक कृत्य अकृत्य अतीते, अहीं नीक नव गऽढ़ू ।
                 हे यौ , अहीं नीक नव गऽढ़ू ।।

ओ जिनगी भरि  कयल ऊकाठी ।
आम  खेलक  आ देलक  आँठी ।
आब  नरक सँ  देखथु  टकटक ।
हम्मर   बोझा , हुनिकर  आँटी ।
रोपल आन बबूड़, गलत छल, अहीँ काँट जुनि रोपू ।
                  हे यौ , अहीँ काँट जुनि रोपू ।।

दऽड़ दड़बज्जा, चौक चौबटिया ।
व्यर्थक  गप्प, अनर्गल  चर्चा ।
एकर फूसि, ओकरा केँ लाड़णि ।
अपन मजा लेऽ अनका चाड़णि ।
अपन समय बहुमुल्य नाश कय, अनका दोष ने मऽढ़ू ।
                    हे यौ , अनका दोष ने मऽढ़ू ।।


 
विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४६, अंक ९२, ‍दिनांक - १५ अक्टूबर २०११ मे प्रकाशित ।





      अरिकोंच (कविता)


हरियर  बड़का – बड़का पात,  देखू  कत्तेक सुन्नर लाग ।
ऊगय  अपनहि – आप,  पनिगर  खत्ता - बाड़ी - झाड़ी ।।

केओ  “अरिकञ्चन”  कहय,   हऽम  कही  “अरिकोंच” ।
अहाँ   “अरकान्चू”   बुझू,  स्वाद  एक्कहि  मनोहारी ।।

पात पिठार  संग बान्हल, सरिसो  तेल चक्का  छानल ।
नेबो  खूब दए झोड़ाओल, पड़िसल तीमन  सोझाँ थारी ।।

संगहि भात  वा  सोहारी, झँसगर अरिकोंचक  तरकारी ।
लागय  भकभक तइयो नीक,  एकर  महिमा छी भारी ।।

गामक बच्चा – बच्चा  जान, शहरक  अलखक   चान ।
जे अछि खएने - सएह बूझय,  आन तीमन पर  भारी ।।


लागय  किनको  जँ  फूसि,  वा हो मन मे  जँ  झूसि ।
चीखि   देखू   एक  बेर ,  लागत   मन  मे  पसारी ।।

 
विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४६, अंक ९२, ‍दिनांक - १५ अक्टूबर २०११ मे प्रकाशित ।




  चन्ना मामा (बालगीत)



दियाबातीक समय थिक । किछु छोट – क्षिण धिया – पुता केर मित्र मण्डली जमा अछि । ओ सभ एतबहु छोट नहि कि किछु नञि बुझल होइ । ओकरा सभ केँ ई तऽ बुझल छै कि रॉकेट नामक कोनो चीज़ होइत छै जे चान पर जा सकैत अछि आ मनुक्खो केँ लऽ जा सकैत अछि । ओकरा सभ केँ ईहो बुझल छै कि फटक्का मे रॉकेट नामक एकटा फटक्का होइत छै जे अकाश मे उड़ैत छै । पर ओ सभ एतबो पैघ नञि कि सभटा बात बुझले होइ । ओकरा सभ केँ ई नञि बूझल जे फटक्का वला रॉकेट नञि तऽ अपनहि चान पर जा सकैत अछि आ नहिञे ककरो चान धरि लऽ जा सकैत अछि । अपन घऽरक पैघ सदस्य द्वारा आनल फटक्का वला रॉकेट केँ देखि कऽ ई अबोध धिया – पुता सभ की की कल्पनाक उड़ान भरैत अछि से एहि बाल – गीत मे वर्णित अछि । देखल जाए :-




चल रॉकेट !  उड़ान भर ।
लऽ चल हमरा चान पर ।
चन्ना मामा शोर करै छथि, बैसल आसमान पर ।।

मामा भेटथिन्ह, मामी भेटथिन्ह ।
नाना भेटथिन्ह, नानी भेटथिन्ह ।
नाना सँ खूब खिस्सा सुनबै, सूतए काल दलान पर ।।

मामा  संगे  सौंसे  घुमबै ।
दुर्गा - पूजा  मेला  देखबै ।
नटुआ नाच, सिनेमा, नाटक, देखबै दुर्गा – थान तर ।।

कचड़ी खएबै, मुरही खएबै ।
रसगुल्ला  बलुसाही खएबै ।
चूड़ा – दऽही – गरम जिलेबी, नथुनी साव दोकान पर ।।

ओहि ठाँ माएक दूध भात नञि ।
ओहि ठाँ बाबू, बहिन, भाए नञि ।
ओहि ठाँ हम ने रहबै हरदम, घुरि फेर अएबै गाम पर ।।



विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४६, अंक ९२, ‍दिनांक - १५ अक्टूबर २०११ मे “बालानां कृते” स्तंभ मे प्रकाशित ।



 
[ उपरोक्त सभ रचनाक प्रकाशन हेतु हम सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुरजी आ समस्त विदेह परिवारक आभारी छी ]

Thursday, 15 September 2011

पद्य - ८ - जे गाबि सकी, से गीत भेल (गजल)

जे गाबि सकी, से गीत भेल (गजल)*





जे गाबि सकी,  से गीत भेल, की गजल - छन्द - कविता - मुक्तक ?
जँ  हो  जजाति,  तऽ खेत भेल,  की आढ़ि – धूर – हत्ता - टटहड़ि  ?? 

हम अंगहीन, कोनो अंग विना,  पर देह सिमित नञि,  अछि व्यापक ।
मुँह – नाक - कान आ पएर - हाथ,  छी हमरहि, पर ने हमर पड़तर ।।

कोँढ़ी  जँ  फुलायल,  फूल  बनल,   गेना – गुलाब – जूही - चम्पक ।
जे फड़य गाछ पर, फऽल कहल,  हो आम – लताम – लकुच – कटहड़ ।।

छी वारि एक,  पर  विविध रूप,  अछि जलधि धरा,  नभ मे जलधर ।
खन शान्त कूप – पोखड़ि – डबरा, खन चंचल सिन्धु – सरित – निर्झर ।।

कर  कलम  हाथ  लिखबाक लेल,  पर मोन पता  नञि  की लीखत ।
अहँ कहलहुँ “गजल”  लिखू - लिखलहुँ, पर गाबि सकब तेँ गीत कहब ।।

अहँ  “अनचिन्हार”,  परिचित भेलहुँ,  पर हम  “विदेह”  सौंसे सञ्चर ?
उन्मुक्त बसात - चिड़ै सन मन,  नहि गजल - गीत,  खिस्सो लीखत ।।


मैथिलीक प्रशिद्ध गजलकार श्री आशीष "अनचिन्हार" जी

         *  वस्तुतः ई गजल नञि थिक, एकर शिर्षक (नाँव) थिक "गजल", अनचिन्हार जी केर आग्रह छलन्हि जे
                 गजल लीखू  - से गजल लीखि देल ।
  *श्री आशीष “अनचिन्हार” जी केर आग्रह पर तथा हुनिकहि समर्पित ।
  


विदेह पाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४५ , अंक ९०, दिनांक - १५ सितंबर २०११ मे प्रकाशित ।

पद्य - ७ - हे प्रिय ! अहँक सुन्नर मुखड़ा

 हे प्रिय ! अहँक सुन्नर मुखड़ा 
          (गीत) 


हे प्रिय ! अहँक सुन्नर मुखड़ा,
                                                    गहुमक  रोटी  सन गोल गोल ।
ने रक्त अधिक, ने श्याम प्रबल,
                                                     गहुमहि सन सुन्नर गोड़ गोड़ ।।



अछि मोन लोभाइत देखि – देखि,
                          दू  टा  फाँरा आमक अचार ।
संगहि राखल  सुन्नर - सुन्नर,
                          मिरचाइक फर दू गोट लाल ।।



की काज अहाँ केँ एहि रोटीक,
                        दऽ दियऽ सखी हम भूखल छी ।
आपस कए जुनि सिर पाप धरू,
                       हम छी अतीथि हम भूखल छी ।।



 विदेह पाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४५ , अंक ९०, दिनांक - १५ सितंबर २०११ मे प्रकाशित ।

पद्य - ६ - बसात (हवा)

      बसात (हवा) 
      (बाल गीत)  





शिल्पकार छी एहि धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।
स्पर्श मात्र कए सकइत छी , निज  आँखि  सँ देखब सपने अछि ।।

ब्रम्हा बनि कखनहु  सृजन करय,
कहुखन  हर  रूप  कराल धरय ।
कहुखन  हरि  सम   पालनकर्त्ता,
कहुखन यम - सद्यः काल बनय ।
ओ जिनगी छी  एहि  धरती केर,
सभ जीवक साँस समाहित अछि ।
एहि  धरती पर  जे  रिक्त लगय,
ओहि शुन्यक बीच प्रवाहित अछि।
नञि  मूर्त  रूप  पओलक  कहियो, पर  दिव्य रूप संवरने  अछि ।
ओ शिल्पकार छी  एहि  धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।।

ओ योगवाहि,  की नञि बुझल ?
ओ  कऽ सकैछ  ककरो संगति ।
जकरा संग,  जा धरि मीत रहय,
तकरे  सन  गुण, तकरे रंगति ।
के नञि जनैछ  पुरिबा – पछिबा,
मलयक बसात के नञि जनइछ ।
ककरा  नञि  अनुभव  चक्रवात,
लू – जेठक  दुपहरिया  तपइत ।
अनल,  अनिल  केर  संग  पाबि, सोनक लंका  केँ  डहने  अछि ।
ओ शिल्पकार छी  एहि  धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।।

कत' विटप उखारल …………


कहुखन एकसरि सरिता  जल पर,
जनु  जलतरंग  ओ बजा  रहल ।
कखनहु  मरु मे  वा सागर  तट,
लीखि बालु सँ अपने  मेटा रहल ।
ओकरा  सोझाँ,  के रहल  अडिग,
बिनु दर्प – दलित, के रहल ठाढ़ ?
कत विटप उखाड़ल, सिन्धु मथित,
भासित  पहाड़,  अपचित  पठार ।
अगनित पाथर केँ काटि – छाँटि, कत रूप - अनूप ओ गढ़ने अछि ।
ओ शिल्पकार छी  एहि  धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।।








 विदेह  पाक्षिक मैथिली इ  पत्रिका, वर्ष   , मास  ४५ , अंक  ९०, ‍दिनांक - १५ सितंबर २०११ मे प्रकाशित ।



Thursday, 1 September 2011

पद्य - ५ - आयल साओन मास सोहाओन

आयल साओन मास सोहाओन
         (गीत)

यल साओन मास सोहाओन,
                         कि चलु सखी , चऽलू ने सखी ।
लागय आजु  धरा मनभाओन,
                         कि चलु सखी , चऽलू ने सखी ।।

छल छल बहइ’छ श्यामा सरिता ।
भेल मलिन मुख देखि ई सविता ।
बहु विधि सजल धजल वृंदावन,
                         कि चलु सखी , चऽलू ने सखी ।
आयल साओन मास सोहाओन,
                         कि चलु सखी , चऽलू ने सखी ।।

मन्द पवन सखी वसन हिलावय ।
मन मानस  मोर मदन जगावय ।
बाजय छमकि छमकि पायलिया,
                         कि चलु सखी , चऽलू ने सखी ।
लागय आजु  धरा मनभाओन,
                         कि चलु सखी , चऽलू ने सखी ।।

सभ सखि मीलि चलू रास रचायब ।
कदमक डाड़ि मे  हिरला  लगायब ।
बजओता माधव मधुर मुरलिया,
                         कि चलु सखी , चऽलू ने सखी ।
आयल साओन मास सोहाओन,
                         कि चलु सखी , चऽलू ने सखी ।।


विदेह पाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४५ , अंक ८९, दिनांक – ०१।०९।२०११ मे प्रकाशित ।

पद्य - ४ - नभ श्याम, धरा श्याम, सभ श्यामल श्यामल

नभ श्याम,  धरा श्याम,  सभ श्यामल श्यामल

भ श्याम, धरा श्याम, सभ श्यामल  श्यामल

भ श्याम, धरा श्याम, सभ श्यामल  श्यामल ।
आइ  लगइ’छ  प्रकृति  श्याम  रंग  मे  रँगल ।।

सुनि   मुरलीक  तान ।
एलीह राधा ओहि ठाम ।
प्रीति  सरिता  मे  डूबि,  भेलीह  राधहु श्यामल ।
आइ  लगइ’छ  प्रकृति  श्याम  रंग  मे  रँगल ।।

श्याम  श्यामक शरीर ।
श्याम यमुनाक  नीर ।
पहीरि साँझक कलेवर , भेलीह  वसुधहु  श्यामल ।
आइ  लगइ’छ  प्रकृति  श्याम  रंग  मे  रँगल ।।

छवि सुन्नर  सहज ।
मूँह  रक्तिम जलज ।
रक्त कंज  बीच खिलल  युगल  श्यामल  कमल ।
आइ  लगइ’छ  प्रकृति  श्याम  रंग  मे  रँगल ।।

श्याम अलकक  कुञ्ज ।
जेना भ्रमरक हो पुञ्ज ।
भासि राहु कोर,  चान  सेहो  श्यामल  श्यामल ।
आइ  लगइ’छ  प्रकृति  श्याम  रंग  मे  रँगल ।।

घीरि आयल  पयोद ।
देखू नचइ’छ कामोद ।
छूबि श्याम, श्याम, श्याम भेल अनिलहु श्यामल ।
नभ श्याम,  धरा श्याम,  सभ श्यामल श्यामल ।।

"विदेह पाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४५ , अंक ८९, दिनांक – ०१।०९।२०११ मे प्रकाशित ।