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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Sunday, 2 August 2015

पद्य - ‍१‍१७ - के छथि मैथिल ? (कविता)

के छथि मैथिल ?
(कविता)


हम मैथिल छी  अतिसहनशील,  ककरो ने अहित  कएलहुँ कहियो ।
अपनहि सीमा संतुष्ट भेलहुँ,  अतिक्रमणक लोभ ने छल कहियो ।।

हम  तरुआरिक  नञि  अनुगामी,
विद्या – बुद्धिक  अभिलाषी  छी ।
कर्कश  धनुषक  टंकार   लागए,
जन्महिसँ  मृदु - मितभाषी छी ।
हम  शान्तिक  हरदम  अनुयायी,
धरती ने सिकन्दर जन्म देलक ।
शोणित  बहाय   सीमा   बढ़बी,
नञि से आकांक्षा  जन्म लेलक ।
नञि  छी   अशोक,  अजातशत्रु,
साम्राज्य शोणितक नञि गढ़लहुँ ।
कायर  ने  बुझब,  जतबा भेटल,
हम  ओतबहिमे  संतुष्ट   भेलहुँ ।
अनको  साम्राज्य  हो  सभ हमरे,  से ईष्ट ने रहल  हमर कहियो ।
हम मैथिल छी  अतिसहनशील,  ककरो ने अहित  कएलहुँ कहियो ।।

रहबाक योग्य जे  भूमि ने छल,
तकरा रहबा केर  योग्य कयल ।
एखनो  भूकम्प आ रौदी – दाही,
तइयो  हारि  ने  हम  मानल ।
ककरो   अरजल   हस्तिनापुरक,
ने हम कहियो  इच्छा  रखलहुँ ।
अपना  बल पर  खाण्डवप्रस्थक,
नव  निर्माणक  हुब्बा  रखलहुँ ।
इतिहास साक्षी  अछि  सदिखन,
रक्षार्थेँ   शस्त्र   उठओने  छी ।
अपना शक्तिक मद – दम्भमे ने,              
हम दोसराकेँ  धकिअओने  छी ।
हमहुँ जीबी,  आनो जीबए,  नञि ताहिसँ  विचलित  छी कहियो ।
हम मैथिल छी  अतिसहनशील,  ककरो ने अहित  कएलहुँ कहियो ।।

पर   सहनशीलता   हम्मर  ई,
अपनेक   नजरिमे   कायरता ।
हमरे  श्रम पर  अहँ ठाढ़ भेलहुँ,
हमरहि  विनाश केर  तत्परता ।
एखनहु  चेतू !  भ्रम  दूर करू  !
अनुचित बेबहार  अपन  बरजू ।
हम्मर अधिकार  उचित जे छी,
से हमरा  सम्मुख  अहँ परसू ।
नाशहि  काल  विनाशहि बुद्धि,
डाकक  छै  कहबी  मिथिलामे ।
बड़  लेल  परीक्षा  धैर्यक   अहँ,
अन्याय  कएल  बड़ मिथिलामे ।
इतिहासे  फेर  कहैत’छि  जे,   सांकाश्यक  दर्प  दलल  कहियो ।
हम मैथिल छी  अतिसहनशील,  ककरो ने अहित  कएलहुँ कहियो ।।


१,२ – मिथिलाक क्षेत्र पहिने रहबाक योग्य नञि छल । दलदल छल आ जंगलसँ पाटल छल । निमि जनक आ हुनक सहयोगी लोकनि अग्निदेवक (आगिक) मदतिसँ एहि दलदलकेँ सुखाए आ जंगलकेँ उपटाए मिथिलाक भूमिकेँ रहबा योग्य बनओलन्हि ।

३,४ – सांकाश्यक राजा सुधन्वा सीरध्वज जनकक राजधानी मिथिला पर आक्रमण कएने छलाह । सीरध्वज युद्धमे सुधन्वाकेँ मारि कऽ अपन भाए कुशध्वजकेँ सांकाश्यक राजा बनओलनि । इतिहास साक्षी अछि कि मिथिलाक लोक राज्य-विस्तारक अहं केर पुर्ति लेल कहियो नञि अपितु अपन रक्षाक लेलमात्र शस्त्र उठओलन्हि अछि ।



13 AUG. 2015  कऽ प्रकाशनार्थ मिथिला दर्पण स्मारिका (मैथिल समाज, बनारस) केर सम्पादकीय कार्यालयकेँ प्रेषित आ नवम्बर 2015 मे प्रकाशित ।



Saturday, 1 August 2015

पद्य - ‍१‍१५ - हमहूँ पढ़बै मैथिली (बाल कविता)

हमहूँ पढ़बै मैथिली (बाल कविता)




हे ऐ बहिनजी, यौ मास्टरजी,
हमहूँ      पढ़बै     मैथिली ।
हिन्दी, ईंग्लिश, जर्मन सीखबै,
पर  ने  बिसरबै  मैथिली ।।

मैथिली बाजथि  दादा - दादी,
नाना - नानी      मैथिली ।
बाहर जा कऽ माम बिसरलाह,
मामी बिसरलीह मैथिली ।।

कक्का - काकी जखन बजै छथि,
हिन्दी   फेंटल   मैथिली ।
बौआ - बुच्चीक मोन होइछ पर,
सीखितहुँ हमहूँ मैथिली ।।

तेँ  टीचरजी   हमरा   पढ़बू,
हम्मर    भाषा    मैथिली ।
आनो  भाषा  नीक लगए, पर
मीठगर छी बड़ मैथिली ।।

गणित - ज्ञान - विज्ञानक भाषा,
जखनहि होयत मैथिली
बुझबामे  भाङ्गठ  नञि  होयत,
अप्पन भाषा मैथिली ।।



30 JULY 2015 कऽ प्रकाशनार्थ मिथिला दर्शन केर सम्पादकीय कार्यालयकेँ प्रेषित ।

तत्पश्चात,

मैथिली पाक्षिक इण्टरनेट पत्रिका विदेह केर ‍216म अंक (‍15  दिसम्बर 2016) (वर्ष 9, मास 108, अंक ‍216) केर बालानां कृते स्तम्भमे प्रकाशित ।

पद्य - ‍१‍१४ - ईद छै कि होली छै (बाल कविता)

ईद छै कि होली छै (बाल कविता)


साभार सौजन्य - pixabay.com (free download)



ईद   छै   कि   होली   छै ।
दुर्गा − छठि − दिवाली  छै ।
हमरा लए हर दिन सुन्नर, कारण इस्कूलमे छुट्टी छै ।।

कक्कर पाबनि, के मनबै छै ।
कहाँ बात से  एतेक फुरै छै ।
हमसभ खुश छी इएह सोचि कऽ, आबै बला छुट्टी छै ।।

ककर जन्म आ कक्कर बरषी ।
सभटा   सरकारक  मनमर्जी ।
हम बच्चासब इएह सोचै छी, एक दिन फेरो छुट्टी छै ।।

रौद छै कड़गर, लूऽऽ चलै छै ।
बर्खा - बुन्नी,  शीतलहरी छै ।
एतेक प्रखर हो हर मौसिम जे, होअए घोषणा - छुट्टी छै ।।



30 JULY 2015 कऽ प्रकाशनार्थ मिथिला दर्शन केर सम्पादकीय कार्यालयकेँ प्रेषित ।

तत्पश्चात,


मैथिली पाक्षिक इण्टरनेट पत्रिका विदेह केर ‍216म अंक (‍15  दिसम्बर 2016) (वर्ष 9, मास 108, अंक ‍216) केर बालानां कृते स्तम्भमे प्रकाशित ।