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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Sunday, 30 October 2011

"ईस्ट - वेस्ट कॉरिडोर" आ "मिथिला"

 
पोरबन्दर - सिलचर द्रुतगामी महामार्ग आ मिथिला
 
ओना तऽ सही मायने मे इतिहासक ने तऽ कोनो प्रारम्भ थिक आ नहिञे  अन्त - ओ समय जेकाँ सतत चलैत रहैत अछि , घटित होइत रहैत अछि । पर एहि कथाक इतिहास शुरु होइत अछि ‍१९३४ केर भूकम्प सँ , जाहि मे भप्तियाही केर रेल पुल खसि पड़ल आ भारत स्थित मिथिला दू भाग मे विभाजित भऽ गेल । 
आधुनिक युग मे मिथिलाक विभाजन एक बेर पहिनहु भेल छल ‍१८‍१६ ई॰ मे जखन कि अंग्रेज लोकनि मात्र २०,००० टाका प्रति वर्षक कर हेतु मिथिलाक एक हिस्सा नेपाल केँ दऽ देल । २ दिसम्बर ‍१८‍१५ व ४ मार्च ‍१८‍१६ केर सुगौली सन्धि (Sugauli Treaty - also spelled Segowlee & Segqulee Treaty) पर हस्ताक्षरक बाद "मिथिला" राजनैतिक दृष्टिएँ दू भाग मे बँटि गेल - "भारतक मिथिला" आ "नेपालक मिथिला"। राजनैतिक स्तर पर फराक भेनहु सांस्कृतिक व भाषायी स्तर पर ओ अविभाज्य रहल ।
अस्तु बात "भारतक मिथिला" केर भऽ रहल छल । भप्तियाही मे रेल पुल ध्वस्त भेलाक बाद ‍१९४७ मे भारत केँ स्वतंत्रता भेटल पर तकर बादो करीब ‍६० साल धरि ओ पुल नञि बनि सकल आ मिथिलाक ई दुहु भू भाग एक दोसरा सँ सीधा सम्पर्कक लेल तरसैत रहल ।
आब NHAI केर एकटा महत्त्वाकांक्षी परियोजना  "ईस्ट - वेस्ट कॉरिडोर"  अथवा "पोरबन्दर - सिलचर द्रुतगामी महामार्ग" पुर्ण होमय जा रहल अछि जे कुम्भक मेला मे हेरायल एहि दुहु भाए केँ फेर सँ मिला सकत ।

ई थिक "ईस्ट - वेस्ट कॉरिडोर" (हरियर) आ "नॉर्थ - साउथ कॉरिडोर" (लाल)  । 
"ईस्ट - वेस्ट कॉरिडोर"  मिथिलाक बीचो - बीच भऽ कऽ जाइत अछि ।
"ईस्ट - वेस्ट कॉरिडोर" (हरियर) सम्पुर्ण मिथिला केँ ताग वा सूत्र जेकाँ गूँथि कऽ एक माला मे परिणत कऽ दैत अछि ।
 
एहि "ईस्ट - वेस्ट कॉरिडोर" केर बनबा सँ पहिने सम्पुर्ण भारतवर्ष मे बहुतो महत्त्वाकांक्षी परियोजना सभ चलाओल गेल आ सफलता पुर्वक सम्पन्न सेहो भेल, पर "मिथिला" ओहि मे कतहु नञि छल । मिथिला रौदी - दाही सँ तबाह होइत रहल, लोक जीवन - मरणक बीच झुलैत  रहल, पर ओकर सुधि लेनहार एहि स्वतन्त्र भारत मे केओ नहि । हाँ कोशी माएक नाम पर राजनैतिक रोटी जरूर सेकाइत रहल । हर साल पता नञि बाढ़िक नाम पर कतेको देशी - विदेशी अनुदान सभ आबैत रहल, पर सरकार एहि क्षेत्रक लेल एकटा स्थाई सड़क वा रेलमार्ग तक नञि बना सकल - आओर नञि किछु तऽ कम सँ कम बाढ़िक समय मे लोक जान बचा कऽ भागि तऽ सकैत वा "उच्चमार्ग" पर फुजल अकाशक नीचा शरण तऽ लऽ सकितए । बहुते सड़क आ रेल मार्ग बनल,  देश भरि मे "अस्पृश्यता भगाउ आन्दोलन" चलल पर औद्योगिक विकाशक आन्दोलन मे मिथिला केँ अछूत बुझि कात कऽ देल गेल ।
ई थिक स्वर्णिम चतुर्भुज जे बिहार मे "डिहरी ऑन सोन" भऽ कऽ जाइत अछि 
स्वर्णिम चतुर्भुज मिथिला केँ स्पर्श तक नञि करैत अछि ।
वास्तव मे किछु "अज्ञात शक्ति" सभ कहियो मिथिलाक स्थिति मे सुधार वा मैथिलक हित नञि चाहैत छल (देखू समकालीन "मिथिला दर्शन" आ आन मैथिली पत्र - पत्रिका सभ)। ओ कहियो नञि चाहैत छल जे मिथिलाक दुहु बँटल भाग एक होअए । ओ कहियो नञि चाहैत छल आ नहिञे एखनहु चाहैत अछि कि मिथिला एकजुट होअए । एहि "अज्ञात शक्ति" सभक हमेशा प्रयास रहल आ एखनहु अछि कि मिथिला एहिना बँटल रहय - दड़िभंगा, कोशी , तिरहुत आ भागलपुर मे । ओ सभ चाहैत अछि जे एहिना रौदी - दाही होइत रहय , मिडीया पर कुदकैत रहय, अनुदानक पेटी अबैत रहय  आ अप्पन पेट भरैत रहय । जँ से नञि तऽ एखन धरि किए कोनो स्थाई औद्योगिक परियोजना एहि धरती पर नञि शुरू कऽ सकल सरकार ? 
बीच मे पं॰ (स्व॰)  ललित नारायण मिश्रजी किछु सार्थक प्रयास शुरु कयलन्हि । ललित बाबू केवल मिथिले नहि समग्र बिहारक बारे मे सोचैत छलाह, बहुत कम लोकनि केँ बूझल होयत कि बिहार मे पर्यटनक विकाशक लेल "जानकी सर्किट" आ "बुद्धिस्ट सर्किट" केर मौलिक परिकल्पना मूलभूत रूपेँ हुनिकहि दूरदर्शी सोच छलन्हि । हुनिकर योजनाक अनुसारेँ समस्त भारतक उत्तर व उत्तरपुर्वी सीमा पर एक द्रुतगामी सड़क मार्ग व रेलमार्ग होयबाक चाही । आसाम सँ दिल्ली जयबाक लेल अनेरो रेल कलकत्ता आ पटना सँ घुमैत, समय बर्बाद करैत किए आबय - सहरसा वा मधेपुरा सँ दड़िभंगा अयबा लेल २४ घण्टाक थका दय वला यात्रा किएक - एक अलग सीमावर्ती रेल लाइन व सड़क मार्ग  किएक ने हो - ई सभ ललित बाबूक अग्रसोचहि छल (भाइ हम कोनो राजनैतिक दलक पक्ष वा विपक्ष मे नञि बाजि रहल छी, हम मात्र ललित बाबूक अग्रसोचक चर्च कए रहल छी) । पर हुनक हत्याक बात स्थिति फेर जहिनाक तहिना वा ताहू सँ बदतर । मिथिला विरोधी "अज्ञात शक्ति" लोकनि मिथिलाक सभ महत्त्वाकांक्षी परियोजना सभ केँ अर्थाभाव कहि बन्न करवा देलन्हि वा आन ठाम स्थानांतरित करवा देलन्हि । एक्कहि परियोजना जँ मिथिला मे भऽ रहल छल तऽ अर्थाभाव आ आन ठाम चलि गेल तऽ मालामाल - वाह ! कत्तेक नीक सोच ??? ...... अजगुत !!!!!! ...... आश्चर्य !!!!!!
जे हो, पर मिथिला ओहिना बँटल रहल, ओहिना कोशी माए केँ अर्ध्य चढ़बैत रहल । दिन बीतल, मास बीतल, साल बीतल आ सालक साल बितैत रहल । जे केओ मिथिलाक विकाश, प्रगति, उन्नति केर लेल काज करए चाहलक तकरा तथाकथित "मिथिला विरोधी अज्ञात शक्ति" सभ साम - दाम - दण्ड - भेद सँ कात लगबैत रहल । बात आयल बिहार मे परिवर्तनक, विकाशक आ ताहि लेल चाही "मौलिक आधारभूत सुविधा" जेना कि बिजली, सड़क आदि । पर ताहू मे मिथिला केँ कात करबाक भरपूर प्रयास भेल आ एखनहु तथाकथित "मिथिला विरोधी अज्ञात शक्ति" सभ द्वारा अथक प्रयास भऽ रहल अछि । सड़कक लेल प्रस्ताव आयल "ईस्ट - वेस्ट कॉरिडोर" नामक द्रुतगामी उच्चपथक, पर तकरो मिथिलाक कात करोट सँ निकालबाक भरपूर प्रारम्भिक प्रयास कयल गेल ।  
थिक "ईस्ट - वेस्ट कॉरिडोर" (पीयर रंगक) केर पुरणा प्रस्तावक (OLD PROPOSAL) मानचित्र जाहि मे ई मिथिलाकेँ मात्र कात - करोट सँ छुबैत (मुज़फ्फरपुर - बरौनी - भागलपुर - पुर्णिया) निकलि रहल छल ।

"ईस्ट - वेस्ट कॉरिडोर" (पीयर रंगक) केर पुरणा प्रस्तावक (OLD PROPOSAL) मानचित्र - बिहार के अंतर्गत आबै वाला भाग नीला चौखुटा मे प्रदर्शित अछि ।
पुर्व प्रस्तावित मार्ग :-  गोरखपुर - गोपालगंज - मोतिहारी - मुजफ्फरपुर - बरौनी - मोकामा - भागलपुर - पुर्णिञा - सिल्लीगुड़ी

बाद मे किछु लोकनिक सकारात्मक प्रयास सँ उपरोक्त प्रस्ताव मे सकारात्मक परिवर्तन आनल गेल आ नीचा देल गेल मानचित्रक अनुसार आब काज पुर्ण होयबा पर अछि । ई उच्चपथ आब मिथिला केर कात करोट सँ छूबि कऽ नञि अपितु मिथिलाक बीचोबीच निकलैत अछि, ठीक ओहिना जेना फूल केँ माला बनओनिहार ताग माला केर ठीक बिचोबीच रहैत अछि । रहल बरौनी आ भागलपुर केर बात तऽ एहि क्षेत्र सभ केँ जरूर थोड़ेक क्षति उठाबय पड‍़ल पर ई सभ क्षेत्र पहिनहु सँ बहुत समृद्ध रहल अछि आ एहि सँ अपेक्षाकृत बहुत कम आहत होयत। बात दड़िभंगा मधुबनी केर सेहो नञि अछि, बात अछि सहरसा, मधेपुरा आ सुपौल सन सन स्थानक जकरा एहि उच्चपथक हमरा जनैत बरौनी आ भागलपुर सँ बेशी खगता रहैक ।

 
"ईस्ट - वेस्ट कॉरिडोर"
(लाल) 
बेतिया, मोतिहारी, सीतामढ़ी, शिवहर, हाजीपुर, मधुबनी, सुपौल आ सहरसा आदि जिला मुख्यालय यद्यपि सीधे एहि उच्चपथ पर नहि अछि पर बेशी फराको नञि अछि तथा कोनो ने कोनो अन्य योजक (Connecting)  राष्ट्रिय राजमार्ग (NH) वा राजकिय राजमार्ग (SH)  द्वारा एहि सँ जुड़ल अछि ।
 

प्रस्तावित" "एखनुका निर्मित" "ईस्ट - वेस्ट कॉरिडोर" केर बिहार मे पड़ए वला भाग केर तुलनात्मक मानचित्र :-

नीला चौखुटा केर भीतर,

पुर्व प्रस्तावित भाग = पीयर
एखनुका निर्मित भाग = गुलाबी
 
अहाँ कहब जे एहि उच्चपथ सँ की फायदा, एखनहु स्थिति तऽ ओहिना बुझाइत अछि - अपनेक कहब किछु हद तक सही अछि । पर एकर बहुत रास दूरगामी परिणाम होयत । मिथिलाक सांसकृतिक समन्वय व आदान - प्रदान बढ़त। बेतिया सँ पुर्णिञा धरि मैथिल सांस्कृतिक व भाषायी एकरूपता आओत । मिथिलाक पच्छिम मे भोजपुरी, पूब मे बंगाली आ दक्षिण मे मगधक दिशि सँ जे सांस्कृतिक प्रहार भऽ रहल अछि आ पुर्वी, पच्छिमी ओ दक्षिणी मिथिला केँ सांस्कृतिक स्तर तथा भाषायी स्तर पर केन्द्रिय मिथिला सँ फराक करबाक जे दुष्चक्र चलि रहल अछि ताहि पर लगाम लागत । आवागमनक सुविधाक कारण परस्पर  परिणय सम्बन्ध बढ़त ( बहुतो लोकनि केँ ई बात अजीब सन लागन्हि पर हमर अनुभवक अनुसार एहि क्षेत्र सभ केँ बीच बहुतो विवाह - प्रस्ताव मात्र एहि लेल अनठा देल जाइत अछि कि एक दोसराक ओहि ठाम जायब दुरूह अछि )  । दड़िभंगा सँ पुर्णिञा केर दूरी एहि उच्चपथ पर लगभग २५० कि॰मि॰ थिक, जँ केओ मात्र ६० -७० कि॰ मि॰ प्रति घण्टाक गतिएँ कोनो वाहन सँ जाथि तइयो करीब मात्र चारि घण्टा लागत , अर्थात लोक एक्कहि दिन मे जा कऽ कोनो काज कऽ कऽ पुनः घुरि कऽ ओएह दिन आबि सकैत अछि । ई पहिने असम्भव सन छल ।
 
 
भविष्य मे ई उच्चपथ मिथिला मे पर्यटनक विकाश मे सहायक सिद्ध होयत कारण जे ई मिथिलाक बीचोबीच जाइत अछि आ बहुतो पर्यटन स्थल या तऽ सीधे एहि उच्चपथ पर अछि या एहि सँ थोड़बहि दूरी पर अछि । कोनो आन राज्यक वा आन देशक पर्यटक कतहु जयबा सँ पहिने ओहि ठामक कानून - व्यवस्था आ आवागमनक साधन (सड़क व रेल मार्ग)  पर जरूर विचार करैत अछि ।
 
ई उच्चपथ अपना संगे भविष्य मे मिथिलाक लेल उद्योग आ व्यापार केर नऽव नऽव अवसरि लऽ कऽ आओत से आशा । मिथिला मे उपजाओल मखान दिल्ली या आन ठाम सँ Packaged Fast Food बना कऽ पुनः मैथिल केँ नञि बेचल जाओत से विश्वास । आब ककरो बनैत घऽर, बरसात मे रोड बन्न भऽ जयबा सँ, सिमेण्टक बोरी नहि पहुँचलाक कारणेँ, नहि  रुकत । आब पोलियो (Polio / Acute flaccid paralysis) सँ ग्रसित कोनो बच्चा , उचित ईलाजक लेल पटना वा दिल्ली जयबाक लेल, बाढ़िक पानि कम होयबाक ४ -५ दिन प्रतिक्षा नञि करत । शुभमस्तु ।
 
।। एहि लेख केँ "इ-समाद" मे प्रकाशित करबाक अनुमति देल गेल अछि ।।
 
हमर ई लेख किछु सम्पादनक संग "इसमाद" मे ‍१६ नवम्बर २०‍१‍१ कऽ प्रकाशित भेल अछि, ताहि हेतु श्रीमति कुमुद सिंह जी आ समस्त इसमाद परिवार केँ बहुत बहुत धन्यवाद । 
 
 
संगहि श्री प्रवीण चौधरी जी केँ ई लेख आगामी विद्यापति स्मृति पर्व समारोह (विक्रम संवत २०६८) केर स्मारिका मे यथास्वरूप छापबाक अनुमति देल गेल अछि ।

Saturday, 15 October 2011

पद्य - ‍१६ - चन्ना मामा (बालगीत)

  चन्ना मामा (बालगीत)



दियाबातीक समय थिक । किछु छोट – क्षिण धिया – पुता केर मित्र मण्डली जमा अछि । ओ सभ एतबहु छोट नहि कि किछु नञि बुझल होइ । ओकरा सभ केँ ई तऽ बुझल छै कि रॉकेट नामक कोनो चीज़ होइत छै जे चान पर जा सकैत अछि आ मनुक्खो केँ लऽ जा सकैत अछि । ओकरा सभ केँ ईहो बुझल छै कि फटक्का मे रॉकेट नामक एकटा फटक्का होइत छै जे अकाश मे उड़ैत छै । पर ओ सभ एतबो पैघ नञि कि सभटा बात बुझले होइ । ओकरा सभ केँ ई नञि बूझल जे फटक्का वला रॉकेट नञि तऽ अपनहि चान पर जा सकैत अछि आ नहिञे ककरो चान धरि लऽ जा सकैत अछि । अपन घऽरक पैघ सदस्य द्वारा आनल फटक्का वला रॉकेट केँ देखि कऽ ई अबोध धिया – पुता सभ की की कल्पनाक उड़ान भरैत अछि से एहि बाल – गीत मे वर्णित अछि । देखल जाए :-



चन्ना मामा शोर करै छथि, बैसल आसमान पर



चल रॉकेट !  उड़ान भर ।
लऽ चल हमरा चान पर ।
चन्ना मामा शोर करै छथि, बैसल आसमान पर ।।

मामा भेटथिन्ह, मामी भेटथिन्ह ।
नाना भेटथिन्ह, नानी भेटथिन्ह ।
नाना सँ खूब खिस्सा सुनबै, सूतए काल दलान पर ।।

मामा  संगे  सौंसे  घुमबै ।
दुर्गा - पूजा  मेला  देखबै ।
नटुआ नाच, सिनेमा, नाटक, देखबै दुर्गा – थान तर ।।

कचड़ी खएबै, मुरही खएबै ।
रसगुल्ला  बलुसाही खएबै ।
चूड़ा – दऽही – गरम जिलेबी, नथुनी साव दोकान पर ।।

ओहि ठाँ माएक दूध भात नञि ।
ओहि ठाँ बाबू, बहिन, भाए नञि ।
ओहि ठाँ हम ने रहबै हरदम, घुरि फेर अएबै गाम पर ।।



विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४६, अंक ९२, ‍दिनांक - १५ अक्टूबर २०११ मे “बालानां कृते” स्तंभ मे प्रकाशित ।




पद्य - ‍१५ - अरिकोंच (कविता)

      अरिकोंच (बाल कविता)




हरियर  बड़का – बड़का पात,  देखू  कत्तेक सुन्नर लाग





हरियर  बड़का - बड़का पात,   देखू  कत्तेक सुन्नर लाग ।
ऊगय  अपनहि - आप,  पनिगर  खत्ता - बाड़ी - झाड़ी ।।

केओ  अरिकञ्चन  कहय,  हऽम   कही  अरिकोंच
अहाँ   अरकान्चू   बुझू,   स्वाद  एक्कहि  मनोहारी ।।

पात  पिठार संग बान्हल,  सरिसो तेल  चक्का  छानल ।
नेबो  खूब दए झोड़ाओल,  पड़िसल तीमन  सोझाँ थारी ।।

संगहि  भात वा सोहारी,  झँसगर  अरिकोंचक  तरकारी ।
लागय  भकभक  तइयो नीक,  एकर  महिमा छी भारी ।।

गामक  बच्चा - बच्चा जान,  शहरक  अलखक   चान ।
जे अछि खएने - सएह बूझय,  आन  तीमन पर  भारी ।।


लागय  किनको  जँ  फूसि,  वा  हो  मनमे जँ  झूसि ।
चीखि   देखू   एक   बेर ,  लागत   मनमे   पसारी ।।


विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४६, अंक ९२, ‍दिनांक - १५ अक्टूबर २०११ मे प्रकाशित ।




पद्य - ‍१४ - बनि जयतहुँ हम बच्चा

  बनि जयतहुँ हम बच्चा (बाल गीत)



घण्टा – घण्टा बन्शी  पाथितहुँ,  रोहुक  आश  लगओने

रोहु – बोआरि ने, पोठी  दू टा,  अबितहुँ  हाथ डोलओने



आइ अनायस,   हमर मोनमे,   सुन्नर सनि  एक इच्छा ।
ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।।


सरस  बसन्तक  अबितहि  भोरे,  बीछय जयतहुँ  टिकुला ।
बिनु  मजड़ल, आमक झाँखुड़ तर,  टाँगि लगबितहुँ हिड़ला ।
दैत्यक  पहड़ा,  जेठ - दुपहरिया,   पर  लोभेँ  बम्बईय्या ।
बौअइतहुँ  गाछी - कलमेँ, पाबितहुँ  मालदह - कलकतिया ।
पाकल पीयर - लाल  बैड़ हम, जेबी भरि - भरि  अनितहुँ ।
लिच्ची जामुन आओर जिलेबी, किछु खयतहुँ, संग लबितहुँ ।

भूत - पड़ेतक डऽर तऽ, चलि  जयतय   पड़ाय  कलकत्ता ।
ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।।


साओन मास − पहिल वर्खा , बम्मासँ खसइत झड़ - झड़ ।
जाय  नहयतहुँ,  जेना  पहाड़क, कल-कल  सुन्नर निर्झर ।
सण्ठीकेँ   धुधुआय   बनबितहुँ,   सिगरेटक  हम  नाना ।
घूरमे  दऽ  अधखिज्जू  आलू ,  तकर  बनबितहुँ  साना ।
चोड़ा - नुका,  निज माए - बापसँ,  जयतहुँ दौड़ल भोड़हा ।
कोमल - हरियर - कञ्च - बदाम, उखाड़ि बनबितहुँ ओड़हा ।

फलना  केँ  रखबाड़  पकड़लक,  भेल  गाम  भरि  चर्चा ।
ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।।


दुर्गापूजा - छठि - दिवाली,   पावनि   तीनि   सहोदरि ।
मास दिवस इस्कूल दरस नञि,  पावनि सम नञि दोसर ।
की भसान केर  छल उमंग !  की सुन्नर हुक्का – लोली !
खेल  कबड्डी - किरकेट - गोली,  खेली  नुक्का - चोरी ।
चौठ - चन्द्र, मिथिलाक विशेषीकृत पावनि अति अनुपम ।
भाँति - भाँति पकवान देखि,  बढ़ि जाय  हृदय स्पन्दन ।
घण्टा - घण्टा बन्शी  पाथितहुँ,  रोहुक  आश  लगओने ।
रोहु - बोआरि ने, पोठी  दू टा,  अबितहुँ  हाथ डोलओने ।

बन्शी लऽ घुमितहुँ भरि दिन,  पोखड़ि - डाबर ओ खत्ता ।
ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।।


विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४६, अंक ९२, ‍दिनांक - १५ अक्टूबर २०११ मे प्रकाशित ‍।


पद्य - ‍१३ - आबहु मीता छोड़ू

  आबहु मीता छोड़ू (गीत)





गोल – गोलैसी,  पर – पञ्चैती ।
गप्प   अनेरोक,   कानाफुसकी ।
                         आबहु मीता छोड़ू ।
दुनिञा देखू दौड़ि रहल अछि, अपने घसड़ब छोड़ू ।
                 हे यौ , अपने घसड़ब छोड़ू ।।

कमजोरहा   पर   देखबी   धाही ।
पुस्त - पुस्त  केर  करी  उखाही ।
बात – बात  पर  लट्ठ - लठैती ।
घऽरे    फनफन,   बाहर   लाही ।
बड़ बुत्ता जँ, अहँक देह मे,  नूतन सर्जन कऽरू ।
               हे यौ ,  नूतन सर्जन कऽरू ।।

ओ केलन्हि, से नीक ने कएलन्हि ।
फलना जिनगी व्यर्थ गमओलन्हि ।
मुइलहा   सारा   कोरि  भर्त्सना ।
सकल  अकारथ   हुनक  सर्जना ।
आनक कृत्य अकृत्य अतीते, अहीं नीक नव गऽढ़ू ।
                 हे यौ , अहीं नीक नव गऽढ़ू ।।

ओ जिनगी भरि  कयल ऊकाठी ।
आम  खेलक  आ देलक  आँठी ।
आब  नरक सँ  देखथु  टकटक ।
हम्मर   बोझा , हुनिकर  आँटी ।
रोपल आन बबूड़, गलत छल, अहीँ काँट जुनि रोपू ।
                  हे यौ , अहीँ काँट जुनि रोपू ।।

दऽड़ दड़बज्जा, चौक चौबटिया ।
व्यर्थक  गप्प, अनर्गल  चर्चा ।
एकर फूसि, ओकरा केँ लाड़णि ।
अपन मजा लेऽ अनका चाड़णि ।
अपन समय बहुमुल्य नाश कय, अनका दोष ने मऽढ़ू ।
                    हे यौ , अनका दोष ने मऽढ़ू ।।



विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४६, अंक ९२, ‍दिनांक - १५ अक्टूबर २०११ मे प्रकाशित ।


Saturday, 1 October 2011

पद्य - ‍१२ - धिया – पुता जनकक वंशज हम

धिया – पुता जनकक वंशज हम 
(बालगीत)


लितहि रहब अछि काज हमर, लगातार अविराम ।
              जा धरि भेटय ने लक्ष्य जीवनक, चाही ने विश्राम ।।

प्रगतिक पथ पर बढ़ैत रहब हम, हरैत विघ्न - बाधा सभ केँ ।
चलितहि रहब जीवनक पथ पर, नाँघैत सरिता गिरि गह्वर केँ ।
सहैत चलब हम सुख – दुःख सभटा, कनिञो  नञि घबड़ायब ।
माए  मैथिलीक  आँचर  पर  नहि, कोनहु  कलंक  लगायब ।

कनक रेख सञो लिखब भारतक विश्व पटल पर नाँव ।
              जा धरि भेटय ने लक्ष्य जीवनक, चाही ने विश्राम ।।

चलैत  रहब  हम अडिग सुपथ पर, नव - नव लय जिज्ञासा ।
प्रेम – स्वतंत्रता - ज्ञानक   भूखल,  रत्नक  नञि  अभिलाषा ।
धिया – पुता जनकक वंशज हम, स्वर्णिम भविष्य केर  आशा ।
अथक  परिश्रम  काज हमर,  बिनु  स्वार्थक  कोनहु  पिपासा।

विश्व पटल पर फेर बनायब मिथिला केर नव पहिचान ।
             जा धरि भेटय ने लक्ष्य जीवनक, चाही ने विश्राम ।।




विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४६, अंक ९१, ‍दिनांक - ०१ अक्टूबर २०११ मे प्रकाशित ।

पद्य - ‍१‍१ - हम नञि कहब कि .........

      हम नञि कहब कि ......... (गीत)


हम नञि  कहब कि  फूल  मे गुलाब  छी अहाँ,


हम नञि  कहब कि  फूल  मे गुलाब  छी अहाँ,
हमर जिनगी केर  स्वप्न ओ “ताज”  छी अहाँ ।
मुदा  जिनगीक एकसरि  अन्हरिया मे विकसित,
सुन्नर   ओ   सुमधुर   प्रभात   छी  अहाँ ।।

हम नञि  कहब  कि “सुष्मिता” सँ नीक छी अहाँ,
“ऐश्वर्या”  केर   जेरॉक्स   प्रतीप   छी   अहाँ ।
अहाँ  नञि   चाही  हमरा,  ई   इच्छा   अहँक,
मुदा  अहीं  हमर  अन्तरा , ओ गीत छी अहाँ ।।

किछु   अन्यथा  ने    सोचब,  से  आग्रह  हमर,
एक  कवि  केर   दुस्साहस  केँ  कऽ  देब क्षमा ।
अहाँ    अँऽही    रहब,   हऽम    हमही   रहब,
अहँक   चाहत     रखबाक     हमर   हस्ती    कहाँ  !!


हम नञि  कहब  कि “सुष्मिता” सँ नीक छी अहाँ,
“ऐश्वर्या”  केर   जेरॉक्स   प्रतीप   छी   अहाँ ।



विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४६, अंक ९१, ‍दिनांक - ०१ अक्टूबर २०११ मे प्रकाशित ।