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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Saturday, 24 March 2012

पद्य - ५३ - होरी नञि, होरीक प्रात रहए

 
होरी नञि, होरीक प्रात रहए




पर अधर  हुनिक  रक्तिम – रक्तिम,
ओ  गाल   गुलाबी – लाल  रहए ।




आइ गेल छलहुँ, हुनिका ओहि ठाँ,
होरी  नञि,  होरीक  प्रात  रहए ।
काजक  तऽ  सिर्फ  बहाना  छल,
छवि - दर्शन केर अभिलाष रहए ।।



सोझाँ अएलीहि, किछु बात बनल ।
बढ़ि  गेल जेना,  मोनक हलचल ।
अति आनन्दित  मुखमण्डल  छल,
आनन्दहि   बिह्वल   गात  रहए ।
आइ गेल छलहुँ, हुनिका ओहि ठाँ,
होरी  नञि,  होरीक  प्रात  रहए ।।



नयन  मिलल, पर थिर ने रहल ।
लाजेँ ने अधर किछु बाजि सकल ।
की  भेल ? - हमहु  स्तब्ध  रही,
मिलनक  अजगुत  एहसास रहए ।
आइ गेल छलहुँ, हुनिका ओहि ठाँ,
होरी  नञि,  होरीक  प्रात  रहए ।।



नहि रंग - अबीर - गुलाल चलल ।
नहि नयनहि केर  ब्यापार चलल ।
पर अधर  हुनिक  रक्तिम – रक्तिम,
ओ  गाल   गुलाबी – लाल  रहए ।
आइ गेल छलहुँ, हुनिका ओहि ठाँ,
होरी  नञि,  होरीक  प्रात  रहए ।।




डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”                                
विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ५१ , अंक ‍१०२ , ‍१५ मार्च २०१२ मे “स्तम्भ ३॰७” मे प्रकाशित ।


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