Pages

मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Powered By Blogger

Sunday, 14 February 2016

पद्य - ‍१५‍२ - हंसक या जलपद (बाल कविता)

हंसक या जलपद (बाल कविता)




हम हंसक, जलपद सेहो कहबी,
लोक  तँऽ  हमरो  हंस कहैए ।*‍१
हंस  भेल  भारतसँ  अलोपित,
लोक  तँऽ  हमरे  हंस बुझैए ।।*‍२

हंस ओ  बत्तख  दुहुक  बीचमे,
हमरहि  तँऽ  स्थान   आबैए ।
की बेजाए  हंसहि सनि  हमरो,
जगमे जञो सम्मान  भेटैए ??

ओहुना  जगमे  कहाँ कतहु छै,
“नीर - क्षीर - विवेकी”  हंस ? *‍३
ग्रीवक  वक्रता  आ  आकारकेँ,
बिसरि जाइ तँऽ  छीहे  हंस ।।*‍४

ओहुना हंसक  प्रतिनिधि रूपमे,
हमरहि  अहँ  सब  बूझी हंस ।
ने विशिष्ट तँऽ,  व्यापक अर्थमे,
हमरा  मानि  सकै  छी  हंस ।।*‍५


संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

*‍१ -  आकार-सुकार आ आन गुणधर्मक आधार पर “हंसक” समूहक जलीय पक्षी “हंस” तथा “बत्तख” केर बीचक जैव श्रृंखलामे अबैछ । तेँ साहित्यमे बहुधा स्पष्ट नामकरण ओ वर्गीकरणक अभाव देखल जाइछ आ उपरोक्त तीनू शब्द भ्रामक रूपेँ परस्पर पर्यायी जेकाँ प्रयुक्त होइत आयल अछि ।

*‍२ - भारतमे (विशेष कऽ पुबारी भारत ओ नेपालमे) कतेको सए किंवा हजार वर्षसँ हंसक प्रवास नञि होयबाक कारण उपरलिखित तथ्य क्रमशः आओरो बलगर होइत गेल अछि ।

*‍३ - नीर-क्षीर विवेकी हंस अर्थात दूध आ पानिकेँ फेंटला पर पृथक करएबला हंस विश्वमे कतहु नञि होइत अछि । ई मात्र साहित्यिक गल्प थिक, वास्तविकता नञि ।

*‍४ - ग्रीवा सुरेबगर वक्रता आ देहक आकारकेँ जँ छोड़ि देल जाए तँऽ हंस ओ हंसकमे बेसी अन्तर नञि ।

*‍५ - ओहुना सम्पुर्ण भारतीय उपमहाद्वीपमे वास्तविक “हंस” केर अनुपस्थितिक कारण सैकड़ों बरखसँ प्रतिनिधिस्वरूप हंसकेकेँ हंस मानल जाइत रहल अछि ।



मैथिली पाक्षिक इण्टरनेट पत्रिका “विदेह” केर ‍195म अंक (‍01 फरबरी 2016) (वर्ष 9, मास 98, अंक ‍154) केर “बालानां कृते” स्तम्भमे प्रकाशित ।



No comments:

Post a Comment