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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

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Saturday, 5 December 2015

गामक शकल सूरत – पोथी समीक्षा

गामक शकल सूरत – पोथी समीक्षा




  
                                              “गामक जिनगीक बाद गामक शकल सूरत .......... नञि ....... नञि ....... तकर बाद नञि, तकर बहुते बाद । पर जे हो, गामक परिवेश आ गामक विषय वस्तु तँऽ अछिए । बदलल की ? ....... बदलल बस कथावस्तु वा सम्पुर्ण कथा । हमरासभक लेल जे एक गोट मामूली दैनन्दिनक घटना थिक से एक गोट सुविज्ञ लेखकक लेल कथा - पिहानीक विषय वस्तु । आ सएह योग्यता श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक लेखनी मे छन्हि । लेखकक एहि लघुकथा संग्रहमे हुनिका द्वारा रचित आठ गोट लघुकथा संकलित अछि ।  कथासभक परिवेश पोथीक नामानुरूपेँ अवश्य ग्रामिण अछि पर पढ़बाक लाभ हरेक पाठकवर्गक लोक उठाए सकैत छथि । परिवेश ग्रामिण रहितहुँ कथावस्तु अत्यन्त सम-सामयिक अछि । जे पाठकवृन्द गामहिमे रहैत छथि हुनिका लेल तँऽ ई रोजक गप्प पर जे बाहरो रहैत छथि आ कहियो-कहियो गाम अबैत छथि हुनिका सेहो एहि कथाक प्रसंगसभसँ जिनगीमे जरूर साक्षात्कार भेल होएतन्हि ।

                             साहित्यमे कएक बेर जिनगीक कटु सत्यक चित्रण प्रत्यक्ष व्यक्ति विशेषकेँ पात्र बना कऽ नञि कएल जाइत अछि अपितु ओहि पात्र विशेषसँ मिलैत जुलैत गुणबला आन सांसारिक वस्तुसभकेँ पात्र बना कहाओल जाइत अछि । साहित्यमे ई विधा बहुत पुराण अछि पर मैथिलीमे एहि विधाक उपयोग अत्यल्प भेल अछि । एहि विधाक उपयोगसँ कथाक विषय वस्तुक रोचकता बढ़ैत अछि, कथामे उल्लिखित कोनहु अप्रिय प्रसंग कोनहु विशेष पाठकवर्ग दिशि प्रक्षेपित नञि बुझाइत अछि आ कथा सुग्राह्य भऽ जाइत अछि । एतबहि नञि तखनि कथाक विषय बस्तु हर-पाठकवर्गकेँ अपनासँ मिलैत-जुलैत बुझना पड़ैत छन्हि आ तेँ कृति सर्वपाठकग्राह्य बनि जाइत अछि । वास्तवमे एहि तरहक प्रस्तुति एकटा कला थिक जे हर लेखकमे नञि विकसित होइछ । वास्तवमे, एहि तरहक प्रस्तुति अप्पन सभ बात पाठकक सोझाँ राखि जाइत अछि आ साहित्यक मर्यादा सेहो बनल रहैत अछि । एहने प्रयोग एहि बेर पाठकलोकनिकेँ श्री मण्डलजीक कलमसँ देखबाक लेल भेंटत; यथा :-

रीशसँ रीशिया ठकुआ बाजल -
केतबो बानर जकाँ नांगरि पटैक कऽ रहि गेलेँ, कहाँ एको धूर जमीन-जत्था अपनो पएर रोपैले भेलौ; जहिना बाप-दादा गुड़कैत एलौ तहिना गुड़कैत रहमेँ । .......................
फेर ठोर पटपटबैत भुसवा बाजल -
कहू ! जे आगूक जनमल ठकुआ छी, तखन केहेन कड़ुआएल बात छै जे जहिना सभ दिन गुड़कैत रहलेँ तहिना गुड़कैत रहमेँ । हमरा जेकाँ की तोरा आसन बासन हेतौ ?

                     छठि पावनिक डालाक विभिन्न बस्तु सभकेँ पात्र बना बहुत सुन्नर रूपसँ अपना समाजक एहि तरहक प्रसंगकेँ चित्रित कएल गेल अछि । एहि तरहक प्रसंग कोनहु वर्गविशेषक नञि अपितु अपना समाजक हरेक वर्गक पिहानी अछि ।  किछ-किछु एहने प्रयोग संस्कृत साहित्यक पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, सिंहासन बत्तिसी आ वैताल पच्चीसी आदिमे देखबामे आबैछ; हलाँकि ई बात अलग जे ओ सभ प्रायः बाल साहित्यक रूपमे लीखल गेल अछि ।

                कतहु शिवचरण बाबू आ कालीचरण बाबूक यारी भेटत तँऽ कतहु भैयारी हक फरिछबैत सदानन कक्काक संग मनमोही काकी भेटतीह । कहुखन पोताक संग जितिया पावनिक करैत जीतलाल बाबा भेटताह तँऽ कहुखन अपन पुर्वकृत्य पर पश्चाताप करैत देवानन्द भेटताह । आ बीचमे चटकार लैत भेटताह सोने कक्का आ सुचितलाल ।

काका, अहाँ ते तेहेन शिकारी जेकाँ बजलौं जे बुइझे ने पेलौं जे खिखिरक बोली देलिऐ कि हरिणक आकि कोइलीक । ……………..
…………… बौआ, तोहूँ कोनो आन थोड़े छह, समाजेक ने बेटा-भातिज छिअ । जेहने अपन बेटा-भातिज तेहने समाजक । बतीस दाँतक तरमे पड़ल छी, तँए जी-जाँति कऽ रखने छी । मुड़ी सुढ़िया कऽ बजैमे उकड़ू होइए । मुदा ऐठाम दुइए गोरे छह तँए जी खोलि बाजब ।

                         गाम - ई शब्द प्रायः हर नऽव पीढ़ीक लेल एकटा सुन्नर, शान्त आ उन्मुक्त सनि स्थान होइत अछि । हर पुरान पीढ़ी किछु बयस बीतलाक बात कहैत अछि जे गाम आब ओहेन नञि रहल (जेहेन ओ अपन नेनपनमे देखने रहथि) - गाम बदलि गेल अछि । एहि तरहक विचारभिन्नताक प्रक्रिया निरन्तर चलैत रहल अछि आ चलैत रहत; पर गाम तँऽ गामहि थिक । अन्तर अछि मात्र दृष्टिकोण (VIEW / ANGLE OF PERCEPTION / REFERENCE FRAME) केर - गाम तँऽ गामहि अछि । कतबहु बदलैत अछि तइयो हर पीढ़ीविशेषक लेल गाम ओ शहरक अन्तर ओतबहि अछि, हर व्यक्तिविशेषक नेनपन ओ वयस्क वा वृद्धावस्थाक लेल गामक परिवर्तन ओतबहि अछि आ से नियत (CONSTANT) अछि । नेना - भुटकाक आँखिमे बसल गामक चित्र अनुभवक आगिमे पाकल वयस्कक चित्रसँ प्रायः हमेशा भिन्न होइत अछि आ होइत रहत । ओकर बनाओल चित्रकेँ बुझबाक हेतु ओकरहि भावक संसारमे डुम्मी काटए पड़त । तेँ मास्टर साहेब (मास्सैव - श्यामलाल) गिरधरक बनाओल समाजक चित्रकेँ नञि बुझि पाबैत छथि जखनिकि सुबललाल ओकर अर्थ पढ़ि लैत छथि । मास्टर साहेब अनुभवक चश्मासँ चित्रकेँ देखबाक प्रयत्न करैत छथि । जखनिकि सुबललाल पोताक (गिरधरक) बालस्वभावमे उतरि चित्रक अर्थ पढ़ैत छथि -

मास्सैव, केहेन बढ़ियाँ तँ सचित्र बनले अछि तखनि विचित्र की ? ……………… पहाड़, समुद्र धरती, पताल, अकास सभ मिलि जे एकटा विराट सूरत बनल अछि, सएह तँऽ अछि।
…………………. ई समुद्र भेल, समाजरुपी समुद्र । अथाह जलराशिक भण्डार । अहूमे जुआर उठै छै, जे हवा, पानिकेँ अपना पेटसँ निकालि अकासमे पसारैए, बर्खाक संग तूफानो उठै छै । जइसँ पानि, हवासँ धरती भरि जाइ छै ।
आगूक बात सुबललालक पेटमे रहनि आकि बिच्चेमे श्यामलाल बाबू दोसर रेखा पर आँगुर रखैत बजलाह - ई ?
ई धार भेल । जेकरा जीवनो-धार कहि सकै छिऐ, जे वैदिक धार कहियो कल-कल हँसैत, प्रवाहित होइ छल ओ आब मरण भऽ गेल । तँए पानिक जगह बालु उड़ैए ।

                         हर प्रसंगक प्रायः एकाधिक पक्ष होइत अछि । किछु पक्ष नीको होइत अछि आ किछु अधलाहो । कएक बेर कोनहु प्रसंगक पक्ष व्यक्तिगत दृष्टिकोण पर निर्भर करैत अछि । जे जाहि दृष्टिकोणसँ देखैत अछि ओहि प्रसंगक पक्ष ओकरा ओहने नीक वा अधलाह बुझि पड़ैत अछि । प्रवास एकटा एहने प्रसंग थिक । प्रवास जे कि एक समय मिथिलासँ बाहर जायब आ तकर बाद देशसँ बाहर जायब केर अर्थ रखैत अछि ।  प्रवासकेँ — खास कऽ विदेशमे रहबाक प्रवासकेँ — मैथिली साहित्य हमेशा किछु तेसरे दृष्टि वा अधलाहे दृष्टिसँ देखलक अछि । किछु एहने सनि पिहानीक मजा भेटत मनोहर कक्का आ श्यामक संग । हाँ, संगमे सजमनि, कदीमा, रामझिमनी, झिमनी, करैल, पालक, ठरिया — आ पता नञि आओर की-की भेटत । आ अन्तमे भेटत

बौआ, कियो केतौ रहह मुदा रहत एही दुनियाँमे । जीब-मरब, अही दू शब्दमे दुनियाँ रचल-बसल अछि । .............................. बड़ बढ़ियाँ बड़ीटा दुनियाँ छै, जेतए मन फूड़ऽ तेतए रहऽ । धारक बीच जिनगी अछि तँए ओतए जा अपन धाराकेँ नञि तोड़ब ।

                     विदेशक चर्च भेल तँऽ किछु बात हमरहु याद आयल । इङ्गलैण्डक अंग्रेजीमे (BRITISH ENGLISH) मुंगेर, रंग, बाघ, श्वेत रक्त कोशिका / कण, रक्त वर्णक आदिक लेल प्रयुक्त शब्दक स्पेलिङ्ग क्रमशः MONGHYER, COLOUR, TIGRE, LEUCOCYTE, HAEMOGLOBIN लिखल जाइत छल आ एखनहु लीखल जाइत अछि । ई सामान्य अंग्रेजी जननिहारक लेल किछु कठिनाह छल । तेँ अमेरिकामे एकर सरलीकरणक प्रयास कएल गेल । उपरोक्त शब्दसभ अमेरिकी अंग्रेजीमे (AMERICAN / SAM ENGLISH) क्रमशः - MUNGER, COLOR, TIGER, LEUKOCYTE , HEMOGLOBIN - एहि प्रकारेँ लिखल जाए लागल । एहि प्रकारक स्पेलिङ्ग सर्वसामान्य द्वारा कएल जा रहल उच्चारणक बेस नजदीक छल आ तेँ सुग्राह्य सेहो । प्रारम्भमे अंग्रेजीक विद्वान ओ साहित्यकार लोकनिक दिशिसँ एहि प्रयासकेँ अतिशय दमण ओ असहयोगक सामना करए पड़ल । एहि नऽव लेखनशैलीकेँ साहित्यिक मञ्चसभ पर हीन दृष्टिसँ देखल जाइत छल । बादमे दुहु देशक सरकार दिशिसँ समन्वयक प्रयास भेल । अंग्रेजी साहित्यक विभिन्न देशक नियामक संस्थासभक बैसार भेल आ निर्णय लेल गेल जे दुहु प्रकारक अंग्रेजी लेखनशैलीक मान्यता एक समान होयत तथा कोनहु लेखन शैलीकेँ आगाँसँ उत्कृष्ट वा कनिष्ठ नञि कहल जाएत । आइ दुहु लेखनशैली समान रूपेँ प्रतिष्ठित अछि । दुहु लेखन-पद्धति प्रचलनमे अछि पर नऽव शैली उच्चारणानुरूप होयबाक कारण बेसी सुविधाजनक अछि आ ग्रेट-ब्रिटेन छाड़ि विश्व भरिमे तेजीसँ पसरि चुकल अछि । 

                  मुख्य विषयसँ थोड़ेक कात-करओट भागि गेलहुँ, पर भोतिआएल नञि छी, कात-करओट भागब सर्वथा आवश्यक बुझना गेल तेँ गेलहुँ । जहिना अंग्रेजीक नऽव शैली छल तहिना मैथिलीमे सेहो नऽव शैली स्वतः आयल जे उच्चारणानुरूप लीखल जाइत अछि । मैथिलीक एहि नऽव शैलीक अन्तर्गत बहुत रास नऽव रचनाकार (अपन रचनाकालक अनुसार नऽव नञि कि वयसक अनुसार) आबैत छथि, जाहिमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी सेहो छथि । अंग्रेजी जेकाँ मैथिलीमे कोनहु उच्च सर्वमान्य नियामक संस्था नञि होयबाक कारणेँ बहुधा एहि नऽव लेखन-शैलीकेँ हीन बुझल जाइत अछि जे कि हमरा नजरिमे सर्वथा अनर्गल थिक । मैथिली साहित्यिक संस्थासभकेँ अंग्रेजी जेकाँ समन्वयात्मक रस्ता अपनेबाक चाही । मैथिलीक प्राचीन आ नऽव दुनु शैली समान रूपेँ प्रतिष्ठित होयबाक चाही । रचनाक स्तरीयता देखल जयबाक चाही नञि कि शैलीक आधार पर स्तर गढ़ल जयबाक चाही ।

                    मैथिलीक नऽव लेखन पद्धति - जे कि उच्चारणानुरूप अछि - ताहिमे रचना होयबाक कारणेँ सामान्य वा सामान्यसँ कम मैथिलि जननिहारकेँ सेहो कोनहु असुविधा नञि होयतन्हि । गामक शकल सूरत नामक एहि लघुकथा संग्रहमे सर्वत्र सरल मैथिलीक प्रयोग भेल अछि । यथा - पावनि केर बदला पावैन, पएने केर बदला पेने, कहलन्हि केर बदला कहलैन, बजलहुँ केर स्थान पर बजलौं, फोलब केर स्थान पर खोलब, जिउब केर स्थान पर जीब, आदि । एहि प्रकारेँ ई लघुकथा संग्रह अपन कथावस्तु आ लेखनशैलीक बल पर पाठकलोकनिक बीच अपन उत्कृष्ट स्थान सुनिश्चित करत से आशा , बाकी पाठकवृन्द पढ़लाक बादे बतओताह ।

पोथीक नाँव गामक शकल सूरत
लेखक श्री जगदीश प्रसाद मण्डल
प्रकाशक श्रीमति प्रेमकला देवी, ग्राम व पो॰-बेरमा (मधुबनी)
प्राप्ति स्थान - पल्लवी डिस्ट्रिब्युटर, वार्ड नं॰-06, निर्मली (सुपौल), पिन कोड - 847452
दाम (अजिल्द / साधारण संस्करण‍)   -  भारतीय रु॰ 151/ मात्र,





मैथिली पाक्षिक इण्टरनेट पत्रिका विदेह केर ‍190म अंक (15 नवम्बर 2015) (वर्ष 8, मास 95, अंक 190) मे प्रकाशित ।



Tuesday, 25 February 2014

पोथी समीक्षा – “मैथिली माध्यमिक रसायन भाग - ‍१”




पोथी समीक्षा – मैथिली माध्यमिक रसायन भाग - ‍१





          मैथिली माध्यमिक रसायन भाग - ‍१ – लेखक डॉ॰ प्रेम मोहन मिश्रजीक मैथिली मे प्रकाशित विज्ञानक दोसर पुस्तकाकार कृति थिक । हुनक पहिल पोथी मैथिली अकार्बनिक गुणात्मक विश्लेषण मैथिली भाषामे विज्ञान विषय पर प्रकाशित हमरा जनैत पहिल पुस्तक अछि । एहि बीच मैथिलीमे विज्ञान विषयक एक गोट आन पोथी प्रकाशित भेल हमरा बीच विज्ञानजकर लेखक छथि डॉ॰ धीरेन्द्र कुमार झाजी आ ई पुस्तक साहित्य अकादमी, नव दिल्लीसँ 2013 केर मैथिली बाल साहित्य सम्मानक लेल चयनित भेल अछि । एकर उल्लेख एहि ठाम अकारण नञि बल्कि सन्दर्भवश भेल अछि । हमरा बीच विज्ञानपुस्तकमे विज्ञानक विविध विषयादि पर लेखकक लेख ओ वार्त्ता संकलित अछि जखनिकि डा॰ प्रेम मोहनजीक दुहु पुस्तक मैथिलीमे रसायन विज्ञानक पाठ्य-पुस्तक छी । ई दुहु पाठ्य-पुस्तक कोनो सरकारी संस्था द्वारा नञि लिखबाओल गेल अछि अपितु लेखकक स्वतःस्फुर्त प्रेरणाक परिणाम अछि । डा॰ प्रेम मोहनजीक पहिल विज्ञान विषयक पुस्तक यद्यपि ग्राहकलोकनिक जेबीसँ कैंचा नञि निकालि सकल तथापि हुनक लगन परास्त नञि भेल आ हुनक दोसर पुस्तक सेहो प्रकाशित भेल आ अपनेसभक सोझाँ अछि । ई लेखकक अगाध मैथिलीप्रेमक परिचायक थिक ।

            “मैथिली माध्यमिक रसायन भाग - ‍१”  नवम् वर्गक छात्र – छात्रालोकनिक लेल लिखल गेल अछि आ तेँ कोनहु ने कोनहु पाठ्यक्रमक अनुसरण आवश्यक । आ चुँकि मैथिल छात्र – छात्रालोकनिक अध्ययन – सहभागिता एकाधिक पाठ्यक्रममे अछि, तेँ ई पुस्तक बिहार बोर्ड”, “सी॰बी॰एस॰ई॰ बोर्ड एन॰सी॰ई॰आर॰टी॰ केर पुस्तकक पाठ्यक्रमसभक दिशानिर्देश लऽ कऽ लिखल गेल अछि ।

          सम्पुर्ण पोथी 82 पृष्ठक अछि आ पोथीकेँ पाँच एकाईमे बाँटल गेल अछि । पहिल एकाई अछि हमर चारू कातक पदार्थ । एहिमे पदार्थक सामान्य परिचयक संग-संग ओकर वर्गीकरण तथा त्रिविध पदार्थक (माने कि – ठोस, द्रव आ गैसक) सामान्य गुण – धर्म केर चर्च अछि । एकर अतिरिक्त एहिमे प्रसरण वा विसरण, पदार्थक अवस्था पर ताप ओ दबावक प्रभाव, गुप्त ऊष्मा तथा वाष्पीकरण आदि भौतिक प्रक्रियासभक वर्णन अछि । एहि एकाई मे बोस-आईंस्टीन कंडेनसेट तथा हिग्स-बोसोन पार्टिकल या गॉड पार्टिकल सन आधुनिकतम जानकारी सेहो देल गेल अछि ।

           दोसर एकाईक नाँव थिक की हमर चारूकातक पदार्थ शुद्ध अछि ? जाहिमे रासायनिक संरचनाक आधार पर पदार्थक वर्गीकरण कएल गेल अछि । एहि प्रकारेँ छात्र व छात्रालोकनिकेँ एहि एकाईमे तत्त्व, यौगिक, मिश्रण, धातु, अधातु, घोर आदि चिर-परिचित शब्दसभ भेटतन्हि । ओकरसभक गुण आ पारस्परिक अन्तर एहि एकाईमे वर्णित अछि । भौतिक ओ रासायनिक परिवर्तनमे अन्तर सेहो एहि ठाम भेटत । संगहि मिश्रणक अवयवसभक पृथक्करणक तरीका सभ सेहो एहि मे देल गेल अछि ।

         तेसर एकाई अछि परमाणु आ अणु । एहि एकाईक नामे सभ किछु कहि रहल अछि । एहिमे विभिन्न तरहक परमाणु सिद्धांतसँ लऽ कऽ अणु, आयन, यौगिक, मोल व रासायनिक समीकरणक सामान्य जानकारी पढ़बा लेल भेटत ।

          चारिम एकाई भेल परमाणु संरचना”, जाहिमे नामानुरूपेँ विभिन्न परमाणु मॉडलसभ (थॉमसन मॉडल सँ बोर-बरी योजना धरि) तथा संगहि परमाणु संख्या, द्रब्यमान संख्या, संयोजकता, समस्थानिक व समभारिक आदिक वर्णन सरल मैथिली भाषामे वर्णित अछि ।

      पाँचम ओ अन्तिम एकाईक नाँव अछि प्राकृतिक सम्पदा ।  ई एकाई पर्यावरण विज्ञान वा भूगोलक बुझना जाइछ परञ्च विभिन्न पाठ्यक्रमक (सिलेबसक) अनुसारेँ एहि ठाम ई एकाई जोड़ल गेल अछि – कारण पर्यावरण विज्ञानक विषय होइतहुँ एहि एकाईक विषयबस्तु बहुत किछु रसायनशास्त्र पर अवलम्बित अछि । एहिमे प्राकृतिक सम्पदाक प्रकार (स्थल, जल ओ वायुमण्डल), वायुमण्डलक महत्त्व, बरखा, विभिन्न प्रकारक प्रदूषण ओ तकर कारण आदि वर्णित अछि । एकर अतिरिक्त विभिन्न प्रकारक जैव-रासायनिक चक्रसभ (जेना कि – जलीय चक्र, नाइट्रोजन चक्र, कार्बन चक्र, ऑक्सीजन चक्र आदि), ओजोन परत, ओ हरियर घर प्रभाव (ग्रीन हाउस इफेक्ट) तथा वैश्विक ऊष्मीकरण आदि गूढ़ विषय अप्पन भाषा मैथिलीमे पढ़बाक हेतु भेटत ।

         पोथीक भाषा अत्यन्त सरल मैथिली अछि । हरेक परिभाषिक शब्दकेँ पहिने तँऽ स्पष्ट परिभाषा देल गेल अछि आ तकर बादे आन प्रकारक सम्बन्धित वर्णन देल गेल अछि ।  विज्ञान विषयक पोथी थिक तेँ भाषा पाण्डित्यपुर्ण-क्लिष्ट नञि भऽ कऽ सरल व सामान्य मैथिली अछि । पोथीक ई सभ विशेषता एकरा रुचिकर ओ स्पष्ट बुझबा योग्य बनबैत अछि । हरेक पारिभाषिक शब्द वा प्रक्रियाक मैथिली नाँवक संग कोष्ठमे ओकर अंग्रेजी शब्द सेहो देल गेल अछि, जाहिसँ छात्र-छात्रालोकनिकेँ भविष्यमे एहि विषयसभ पर छपल कोनो अंग्रेजी लेख वा पोथीकेँ पढ़बाकाल असौकर्य नञि होन्हि । हरेक एकाईक अन्तमे ओहि एकाईसँ सम्बन्धित महत्त्वपुर्ण तथ्यसभ देल गेल अछि तथा संगहि अभ्यासक लेल प्रश्न सेहो । ई दुहु वैशिष्ट्य पाठकलोकनिकेँ प्रतियोगिता परीक्षासभमे सहायक होएतन्हि ।

         संसारक कोनो बस्तु सर्वगुण संपन्न नञि भऽ सकैत अछि आ तेँ ई पोथी सेहो । समीक्षक वा समालोचकक कर्त्तव्य थिक कि समीक्ष्य विषयक धनात्मक ओ ऋणात्मक दुहु पक्षकेँ ऊजागर करथु । एहि पोथीमे बहुतेक स्थानपर कर्मकारक ओ सम्बन्धकारकक विभक्ति चिह्न (क्रमशः केँकेर) परस्पर बदलि गेल अछि । किछु स्थान पर ठेठ मैथिलीक पारिभाषिक शब्दसभक प्रयोग भेल अछि (जेना कि – Solution केर लेल घोर, पृष्ठ – 23 पर) – ई नीक बात । परञ्च अन्यत्र किछु जगह हिन्दी शब्द ऊकरू लगैछ, यथा – Heap  शब्द लेल ढेरी”  प्रयुक्त नञि भऽ कऽ ढ़ेर”  शब्द प्रयोग भेल अछि । एहिना एकाई पाँचमे जे विभिन्म चक्रसभक वर्णन अछि ओहि संगहि जँ रेखाचित्र सेहो रहैत तँऽ पाठकलोकनिकेँ समझबामे आओर ओकरासभकेँ याद रखबामे विशेष सुविधा होएतन्हि ।

        उपरोक्त किछु कमीसभ केर रहितहुँ पोथी प्रशंसनीय आ पठनीय अछि । सरल मैथिलीक प्रयोगसँ बोधगम्य अछि । संगहि सुन्दर आकर्षक मुखपृष्ठ तथा स्पष्ठ छपाई पढ़बाक उत्कण्ठाकेँ बढ़बैछ । रसायनशास्त्रक छात्र-छात्रा तथा शिक्षकलोकनिसँ निवेदनहि नञि अपितु पुर्ण आशा अछि जे ओ एहि पोथीकेँ पढ़ि कऽ लाभान्वित होथि आ संगहि लेखककेँ प्रोत्साहित करथु कि ओ भविष्यमे एहि पोथीमे आओरो निखार आनथि । आ एतबहि नञि ओ मैथिलीमे आओरो विज्ञान विषयक पोथीसभक रचना आ प्रकाशन कऽ सकथि ।

समीक्षित पोथीक नाँव – मैथिली माध्यमिक रसायन भाग ‍१
लेखक – प्रो॰(डॉ॰) प्रेम मोहन मिश्र
प्रकाशक – ब्रिलिएण्ट प्रकाशन, अशोक राजपथ, पटना – ४
प्रकाशन वर्ष – २०१२
दाम – ८० टका मात्र ।

समीक्षकः-
डॉ॰ शशिधर कुमर
ग्राम – रुचौल (दुलारपुर – रुचौल)
पो॰- मकरमपुर
जिला – दरिभंगा (मिथिला) 



मिथिलांचल टुडे (दिसम्बर २०‍१३ - जनबरी २०‍१४ अंक) मे प्रकाशित ।

Monday, 25 June 2012

पोथी समीक्षा - अम्बरा


पोथी समीक्षा - अम्बरा








                  कोनहु भाषाक जिबैत होयबाक प्रमाण की ? इएह जे जाहि क्षेत्र विशेष मे ओ भाषा बाजल जाइत अछि ओहि क्षेत्रविशेष केर हरेक व्यक्ति (वा अधिकांश व्यक्ति) ओहि भाषा केँ अपन मातृभाषाक रूप मे बजैत हो । “हरेक” मतलब हर वर्गविशेषक लोक – चाहे ओ कोनहु वयसमूहक हो,  चाहे ओ कोनहु जातिक हो, चाहे ओ कोनहु धर्मक हो अथवा कोनहु व्यापार / व्यवसाय सँ जुड़ल हो । मात्र बजैत हो - सएह टा नञि, अपितु ओहि भाषाविशेष मे अपन रचनात्मक ओ सर्जनात्मक योगदान सेहो करैत हो । “मैथिली” केँ सम्पुर्ण रूपेँ ई सौभाग्य आइ धरि कहियो नञि भेँटि सकल ।


               एक दिशि, कोनहु “एक समूह” कोनहु “दोसर समूह” केँ मैथिली नञि बाजय देलखिन्ह वा नञि पढ़ए - लिखए देलखिन्ह आ “मैथिली” केँ अपन बपौती सम्पत्ति बना कऽ रखलन्हि । दोसर दिशि, चुँकि “पहिल समूह” मैथिली केँ अपन बपौती सम्पत्ति कहि देलन्हि तेँ “दोसर समूह” सेहो मैथिली बाजब वा मैथिली पढ़ब – लिखब छाड़ि देलन्हि । मैथिलीक लेल ई परम दुर्भाग्यक गप्प रहल । घऽर - घरारी आ सम्पत्तिक बँटवारा भऽ सकैत छै, माएक नञि; मैथिल लोकनि केँ से बात बुझबा मे बहुत विलम्ब भेलन्हि । कारण जे हो, पर “माए मैथिली” केँ ई सौभाग्य आन समकक्ष भाषाक अपेक्षा बहुत काल धरि नञि भेँटि सकलन्हि ।


                  सम्प्रति खुशीक बात ई जे पछिला किछु वर्ष सञो समय बदलल अछि आ हरेक वर्गविशेषक लोक अपन रचनाशीलता सँ माए मैथिलीक आँचर भरि रहल छथि । शुरुआत मे गति बहुत सुस्त छल आ श्री विलट पासवान “विहंगम” वा स्व॰ फजलुर्रहमान हासमीजी सन एक – आधहि टा नऽव नाम देखबा मे अबैत छल पर आइ एहेन नाँव सभक संख्या बहुत तेजी सञो बढ़ल अछि । एहने एक गोट वरिष्ठ रचनाकार छथि श्री राजदेव मण्डलजी । आइ हुनिकहि लिखल एक गोट काव्य संग्रह “अम्बरा” केर समिक्षा लऽ कऽ हम अपनेक सोझाँ उपस्थित छी ।


               “अम्बरा” - रचनाकारक गोटेक पचहत्तरि टा काव्य रचना केँ अपना मे समाहित कएने अछि । सभटा कविता “अमित्राक्षर छन्द” मे अछि । पर डेरएबाक काज नञि; “अमित्राक्षर छन्द” रहितहुँ “मित्राक्षर छन्द” केर रचना सन प्रतीत होयत आ पढ़बा मे ओहने लयबद्ध आ रुचिगर लागत । यथा :-


अहाँ कहैत छी – कायर बनबसँ नीक
हिंसक भऽ जाएब से अछि ठीक
लोक कहत - वाह-वाह
किन्तु हमरा लगैत अछि ई अधलाह ......................... “अहिंसक वीर”


              बिनु उचित शब्द केर भाव मरि जाइत अछि आ बिनु भावक शब्द तँ शब्दकोशहि बुझू । पर ई दोष एहि कविता संग्रह मे कतहु देखबा मे नहि आओत । उचित शब्द ओ समीचीन भाव केर अजगुत संगम देखबा मे अबैछ । जेना कि


तप्त रेतपर
फरफड़ाइत माछ
कानि – कानि
कऽ रहल नाच
रेतापर फाड़ैत चीस
उड़बाक लेल आसमान दिश
अभागल
देहसँ झड़ए लागल
चाँदीकेँ कण
झूमि उठल
कतेको आँखिक मन
जरि रहल माछक तन ........................ “बाउल परक माछ”


               सम्पुर्ण काव्य रचना विशुद्ध खाँटी मैथिली मे थिक; हँ कत्तहु – कत्तहु किछु हिन्दी शब्दावलीक प्रयोग ठीक सँ मेल नञि खाइत अछि, पर से अत्यल्प । भाषा बहुतहि सहज ओ स्वभाविक थिक आ ताहि कारणेँ पढ़बा काल घटनाक्रम वा वर्णित विषय पाठककेँ अपना समक्ष घटित होइत प्रतीत होएतन्हि । जेना कि देखल जाओ


शब्द नहि रहल दिलक बोल
तेँ नहि रहल ओकर मोल
......................... .................
बजैत रहैत छी अमरीत बोल
भीतर रखने बीखक घोल ......................... “दिलक बोल”


                  कोनहु साहित्य मे जँ विविधता नञि हो तँ ओ सम्पुर्ण नञि कहबैछ । जहिना भोजन मे षड्‌रस केँ भेनाइ आवश्यक तहिना साहित्य मे नवरस ओ तकर उपरस सभक समावेश परमावश्यक । मात्र शिंगार ओ भक्ति रसोपरस सँ साहित्य समग्र नञि भऽ सकैछ – एहि प्रकारक साहित्य श्रृजन एकभगाह ओ असन्तुलित कहबैछ । “अम्बरा” मे ई दोष नञि । एहि छोट – क्षिण काव्य संग्रह मे बहुत अधिक “विषय - वैविध्य” थिक । हरेक रचना भाव – स्वभाव मे एक दोसरा सँ भिन्न । आ इएह एकर सभसँ पैघ विशेषता थिक । एक दिशि “जाति” आ “हम फेर उठब” सन रचना जञो सामाजिक वैषम्य पर प्रहार करैछ तँ दोसर दिशि “ज्ञानक झण्डा” सन कविता समाज मे पसरल अंधविश्वास आ अशिक्षा पर । कमजोर वा दलित व्यक्तिक मनोदशाक केहेन मार्मिक चित्रण कएल गेल अछि से देखू


टप – टप चुबैत खूनक बूनसँ
धरती भऽ रहल स्नात
पूछि रहल अछि चिड़ै
अपना मन सँ ई बात
आबऽ बाला ई कारी आ भारी राति
कि नहि बाँचत हमर जाति ..... ? ................. “चीड़ीक जाति”


        “हथियारक सभा” आ “अहिंसक वीर” सन रचना कोनहु समस्याक शान्तिपुर्ण समाधान करबा पर ओ अहिंसा पर जोर दैछ आ अनेरोक रक्तपात व नक्शलवादी प्रवृत्ति केँ विरोध करैत बुझना जाइछ । देखल जाओ


सुनह लगाबह ध्यान
खोलह अपन अपन कान
तब भेटतह आजुक सम्मान
बिनु देहसँ गिरौने रकत
कऽ सकैत छह दोसर जुगत
................................................ .........
बिनु हिंसाकेँ जे कएने होयत हृदयपर राज
ओकरे भेटत ई अमूल्य ताज ......................  "हथियारक सभा"


           एहि पोथी मे “मुनियाँक चिन्ता” आ “कथीक गाछ” नामक बालकविता सेहो अछि, जाहिमे बहुत सुन्नर ढंग सँ बाल मनोभाव केँ व्यक्त कयल गेल अछि । मुनियाँक छोट भाए केर जन्म भेलै, पूरा परिवार खुशी मना रहल छल आ मुनियाँ कानि रहलि छलि । पुछला पर की उत्तर भेटलैक से अपनहु सभ सुनू


ई तँ छै खुशीक बात
जनमल तोरा भाए
कतेक खुशी छह तोहर माए
दादी, सबटा जानै छी
हम ओहि लए नहि कानैत छी
चिन्ता अछि हमरा आब के कोराकेँ लेत
दूधो माए पिबऽ नहि देत ........................ “मुनियाँक चिन्ता”


                 “गाछक हिस्सा” आ “गाछक बलिदान” पर्यावरण असन्तुलन ओ तकर रक्षण दिशि ध्यानाकृष्ट करैछ जखन कि “मनोवाणछित चान” आ “परेमक अधिकार” किञ्चित् शिंगार रसक कविता थिक । “बाढ़िक चित्र” नामक कविता मे २००८ ई॰ मे कुसहा लऽग टुटल कोसीक बान्ह सँ आयल बाढ़िक बहुत मर्मस्पर्शी आ सजीव चित्रण कयल गेल अछि । किछु अंश द्रष्टव्य थिक


एहसरि
अर्धनग्न स्त्री
परिश्रान्त
मुख क्लान्त
बैसल अछि धारक कात
देह स्नात जिअत अछि कि मुइल
साइत सोचि रहल अछि इएह बात
एखनहि निकलल अछि
संघर्ष कऽ बाढ़िक धारा सँ ........................ “बाढ़िक चित्र”


      सम्प्रति मैथिली साहित्यक दशा – दिशा, मैथिलीक प्रति कविक प्रतिबद्धता ओ ताहि सन्दर्भ मे देल गेल स्पष्टीकरण देखल जाओ


दोसरोक माय
अछि हमरे माय
तँ कि यौ भाय
अपना मायकेँ बिसरि जाइ
..........................................
मैथिलीक अछि असीम भण्डार
एहि बात केँ हम सोचि ली
घर भरल हो जखन
दोसरासँ किएक पैंच ली
राखि संतोष करी उपाय
की यौ भाय । ....................................... “माय”


               ओना तँ हरेक कविता चर्चाक अपेक्षा रखैत अछि पर से सम्भव नञि । जहिना भात सीझलै कि नञि से ओहि मे सँ मात्र एक टा दाना केँ छूबि अन्दाज लगाओल जा सकैछ आ तहिना उपरोक्त किछु उदाहरण सभ सँ समग्र पोथीक अनुमान । व्याकरण केर दृष्टिकोन सँ एहि पोथीक एक गोट खास विशेषता अछि जे विभक्ति (कारक चिन्ह वा शब्द) प्राचीन मैथिली जेकाँ मूलशब्द केर संगहि लिखल गेल अछि ।* अन्त मे मैथिलीप्रेमी पाठक लोकनि सँ एतबहि कहए चाहबन्हि कि ई कविता संग्रह हुनिका आशा सञो बेसी रुचिगर लगतन्हि । 





पोथीक नाँव :– अम्बरा ( मैथिली कविता संग्रह)
लेखक :– श्री राजदेव मंडल
प्रकाशक
:– श्रुति प्रकाशन ८/२१, भूतल, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली - ‍११०००८
दाम :– ‍१०० टाका मात्र







* प्राचीन मैथिली मे संस्कृतक प्रभावक कारणेँ कारक चिन्ह वा विभक्ति मूलशब्दक संगहि लिखल जाइत छल । आधुनिक मैथिली मे बहुधा फुटका कऽ लिखल जाइत अछि अथवा मिश्रित स्वरूप मे ।  मिश्रित स्वरूप - माने कि किछु कारक चिन्ह संग मे (यथा – कारणेँ) आ किछु फुटका कऽ (यथा – चौकी पर) । संस्कृत मे विभक्ति चिन्ह वा शब्द नञि होइत अछि अपितु मूल शब्द मे विकार उत्त्पन्न कए “शब्द वा धातु रूप” बनाओल जाइत अछि तेँ ओ हमेशा मूलशब्दक संगहि रहैछ । पर मैथिली समेत आन आधुनिक भारतीय आर्यभाषा सभ मे ई शब्दविकृति वा धातुविकृति नञि होइछ (अधिकांशतः) आ तेँ कारक केर विभक्ति निरूपनार्थ अलग आखर वा शब्द होइत अछि ।






डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”                                


विदेहपाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ५४ , अंक ‍१०८ , ‍१५ जून २०१२ मे “स्तम्भ २॰६” मे प्रकाशित।