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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

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Saturday, 13 February 2016

पद्य - ‍१५‍१ - हंस (बाल कविता)


हंस (बाल कविता)



हंसक बीच  ने  बगुला  शोभए,
बड़   पुरान   ई  कहबी  छी ।*‍१
बगुला   खेत - पथार  भेटैतछि,
हंस केहेन − नञि  देखने छी ।।*‍२

सरस्वती माएक  वाहन अछि,
चित्रमे  हम  से  देखने छी ।*‍३
अंग्रेजी केर ‘एस’ सनि गर्दनि,
बस  किताबमे  पढ़ने  छी ।।*‍४

सुनै जो बौआ ! सुनै गे बुच्ची !
एहि  ठाँ   हंस  प्रवासी  छी ।
उत्तर  दिशि  अतिशीत क्षेत्र जे,
ताहि  ठामक  ओ वासी छी ।।*‍५

एहि ठाँ जे  आबैत  हंस छल,
देह - पाँखि उज्जर होइ छल ।
लोलक  उद्गम - स्थल कारी,
लोल गाढ़ - पीयर होइ छल ।।*‍६

शीत  समयमे   छल  आबैत,
कहियो  ओ उड़ैत हिमालयसँ ।
अपनहुँ ठाँ  देखना जाइत छल,
सटल  जे  क्षेत्र  हिमालयसँ ।।*‍७

चर्चा  अछि  साहित्यमे  सौंसे,
मानसरोवर - श्वेत हंस  केर ।
करैछ  ईशारा  टपि  हिमगिरि,
ने बेसी काल रहैछ हंस फेर ।।*‍८

विश्वक छै मौसिम बदलि गेल,
पहिनुक सभटा छै उनटि गेल ।*‍९
बीतल कए बरख, कतेक पुस्त,
ने हंसक छी  आगमण भेल ।।*‍१०

सए बरख - हजार पता नञि से,
कहियासँ  हंस  निपत्ता  अछि ।
साहित्यमे  सौंसे  धवल - हंस,
पर दर्शन हएब सिहन्ता अछि ।।*‍१०

हंसक  ई  अर्थ  विशिष्ट  भेल,
सामान्य अर्थ बड़ व्यापक अछि ।
बहुविध  जलीय  पक्षी  शामिल,
कलहंस, राज आ जलपद अछि ।।*‍११

ओना तँऽ अप्पन शास्त्र कहैतछि,
हंस   होइत   अछि   उज्जर ।
मुदा   हंस  किछु  कारी  सेहो,
भेटैछ   एहि   धरती    पर ।।

किछु एहनो छी हंस जकर बस,
गर्दनि टा    कारी    होइए ।
जँ  बूझी अहँ  हंस धवल बस,
तँऽ    विश्मयकारी   होइए ।।*‍१२







संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

*‍१ - ‘न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये वको यथा’ - संस्कृतहि युगक कहबी छै ।

*‍२ - छोटकी बगुला सभ तँऽ बहुतायतमे पानि लागल खेत - पथारसभमे देखबामे आबैत अछि । पर हंस अपना दिशि केओ नञ देखने अछि । जँ केओ देखने अछि तँऽ मात्र चित्रमे वा प्राणी उद्यानमे अथवा जँ केओ कीनि कऽ पोषने हो ।

*‍३ - धवल-श्वेत होयबाक कारण हिन्दू धर्म शास्त्रक अनुसार हंसकेँ माए सरस्वतीक वाहन मानल गेल अछि । देवी सरस्वतीक चित्र वा प्रतिमाक संग प्रायः हंसक चित्र वा प्रतिमा सेहो रहैत अछि । यद्यपि ओ चित्र वा प्रतिमा काल्पनिक होइत अछि पर परम्पराक आधारेँ बनैछ तथा ओ परम्परा अति प्राचीन अछि - हजारों वर्ष पुरान ।

*‍४ - किताबसभमे वर्णन रहैछ कि हंसक गर्दनि अंग्रेजी वर्णमालाक “एस” (S) आखर सनि होइत अछि ।

*‍५ *‍७ - अतिप्राचीन कालहिसँ भारतीय साहित्यमे हंसक प्रवासी होयबाक बात कहल गेल अछि जे कि हिमालयसँ सटल भू-भागमे हिमालय शिखरसँ उतरि मात्र शीतऋतुमे आबैत छल ।

*‍६ - पारम्परिक जनश्रुति ओ संस्कृत आ आन संस्कृतेतर साहित्यसभसँ ज्ञात होइत अछि कि हंसक धऽर आ गर्दनि धवल श्वेत वर्णक होइत छल जखनि कि लोल गाढ़ पीयर रंगक । लोल जाहि ठाम मूरीसँ जुड़ल रहैत छल ओहि ठामसँ आँखि धरिक स्थान कारी होइत छल ।

*‍८ - कैलास पर्वत पर मानसरोवरमे हंस रहैत अछि, ओतहिसँ ठण्ढीमे आबैत अछि आ फेर ओतहि चलि जाइत अछि । ई एकटा ईशारा थिक कि हिमालय वा हिमालयसँ आओरो आगाँ (उत्तर वा उत्तर-पच्छिम दिशि) हंस सभक मूल निवास स्थान अछि ।

*‍९ - विश्वक जलवायू आ मौसिम निरन्तर बदलैत रहैत अछि । केवल आजुक ‘हरित गृह प्रभाव’ तथा ‘वैश्विक गर्मी’ केर बात नञि अछि । किछु हजार वर्ष पहिनहु मौसिमक बदलावक संकेत आयुर्वेदक महान कृति “सुश्रुत संहिता”मे भेटैछ । जखनि कि हंसक प्रथमोल्लेख ऋग्वेदमे भेटैछ । आयुर्वेद अथर्ववेदक उपांग मानल जाइत अछि जे कि निश्चित रूपेँ ऋग्वेदसँ नऽव अछि ।

*‍१० - विगत कतेको सए अथवा हजार वर्षसँ हिमालयक दच्छिनमे आ खास कऽ दच्छिन-पूबमे हंसक प्राकृतिक रूपसँ आगमण नञि भेल अछि । ओहिसँ पहिने सम्भवतः “मूक हंस / म्यूट स्वान” (MUTE SWAN) ठण्ढीमे भारतक हिमालयसँ सटल क्षेत्रसभमे आबैत छल किएक तँऽ भारतीय वाङ्गमयमे वर्णित हंस केर विवरण ओकरहिसँ मेल खाइत अछि । ई हंस विश्व केर आन हंस आ जलपदक अपेक्षा कम हल्ला मचबैत अछि तेँ ओकरा अंग्रेजीमे “म्यूट स्वान” (MUTE SWAN) कहल जाइत अछि जकर मैथिली अनुवाद भेल “मूक हंस” । ई हंस पुर्ण रूपसँ बौक नञि होइत अछि अपितु अपेक्षाकृत कम बजैत अछि ।

*‍११ - “हंस” शब्द  जखन अगबे प्रयुक्त होइत अछि तँऽ ओहि शब्दसँ जाहि विशिष्ट चिड़ै केर बोध होइत अछि से अंग्रेजीमे “स्वान” (SWAN) कहबैत अछि जकर गर्दनि अंग्रेजीक “एस” आखर सनि होइत अछि । ई “हंस” शब्दक विशिष्ट अर्थ भेल । “हंस” शब्द  जखन हंस सदृश समस्त जलीय पक्षीक बोध करबैत अछि तखन ओहि मे हंस केर अलावे आन जलीय पक्षी (जेना कि - हंसक वा जलपद) सेहो आबैत अछि । ई “हंस” शब्दक सामान्य अर्थ भेल  । जखन हंस शब्द आन कोनहु विशेषण या उपसर्गक संग (यथा - कलहंस, राजहंस आदि) आबैत अछि तँऽ ओहिसँ तदनुरूप आन कोनहु जलीय पक्षीक बोध होइत अछि ।

*‍१२ - भारतीय वाङ्गमयमे यद्यपि मात्र धवल-श्वेत हंस केर चर्च भेटैत अछि पर पृथिवीक दच्छिनी गोलार्ध केर महाद्वीप सभमे कारी हंस सेहो भेटैत अछि । दच्छिनी अमेरिका महाद्वीपमे हंसक जे प्रजाति भेटैछ तकर गर्दनि आ मूरी कारी तथा धऽर उज्जर होइत अछि । ऑस्ट्रेलिया महाद्वीपमे भेटए बला हंस केर मूरी, गर्दनि आ धऽर पूरा कारी होइत अछि ।





मैथिली पाक्षिक इण्टरनेट पत्रिका “विदेह” केर ‍195म अंक (‍01 फरबरी 2016) (वर्ष 9, मास 98, अंक ‍154) केर “बालानां कृते” स्तम्भमे प्रकाशित ।

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