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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Monday, 14 December 2015

अनिलजी – व्यक्तित्त्व आ कृतित्त्व (श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर "अनिल" जी पर आधारित)

अनिलजी – व्यक्तित्त्व आ कृतित्त्व


परिचय -
छोटे मोटे टूटल मड़ैया मे गौरी कोना कऽ रहती हे ?
गौरी हमर
छथि बड़ सहलोला ।
कोना कऽ
पिसती भाङक गोला ।
हाथो मे पड़तनि लोढ़ीक ठेला, कोना कऽ सहती हे ?

             एक समय छल जखन ई गीत हमरा गामक हर बेटीक बिदागरी काल किनको ने किनको मूँहेँ अवश्य सुनबामे अबैत छल । ओहि समय हम बहुत छोट रही । सम्भवतः L.K.G. मे पढ़ैत रही । बाद मे आनो गाम-गमाइतमे सुनबामे आयल । एखनहु अबैत अछि । एहिना एकटा डहकन सेहो –

सऽमधि (सऽमैध) एला बनि – ठनि कऽ ।
धोती कुरता पहीरि कऽ ।
एला डहकन सुनऽ बेटा के(र) बियाहमे ।।

हम सब कऽरै छी पुछारि (पुछाइर),
बाजू गीत सुनब कि गारि (गाइर),
आ कि उलहन सूनब बेटा के(र)  बियाहमे ।
आ कि डहकन सूनब बेटा के(र) बियाह मे ।।

             एहि डहकनक पहिल दू – चारि पाँती तऽ एहिना रहैत अछि पर अगिला पाँतीसभ गायिका लोकनिक सुविधानुसारेँ घटैत – बढ़ैत रहैत अछि । परञ्च पुरान नञि भेल अछि, एखनो जतऽ - ततऽ सुनबा मे अबैत अछि । एहिना एकटा गीत अछि -

कक्का मारल गेला
सौराठक मैदान मे ।
पहिले कन्यादान मे (ना) ।।

              सौराठक मैदान मरनासन्न भऽ गेल पर ई गीत एखनहु अपन किशोरावस्थहिमे अछि । ई सभ गीत हम अपन नेनपनेसँ सुनैत आबि रहल छी । एखनहु विविध बिधि – बेबहार काल सुनबामे अबैत अछि ई गीत सभ । ओहि समय हम एहि गीत सभकेँ पारम्परिक गीत बुझैत रही, हमरा नञि पता छल कि एकर लेखक के छथि । किछु बादमे बुझबामे आयल कि ई सभ गीत अनिलजीक लेखनीसँ निकलल अछि । अनिलजी माने कि श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर “अनिल

छायाचित्र ०१ –
श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’जी (सन् ‍१९९६-९७ ई॰क छायाचित्र)

प्रारम्भिक जीवन आ गीत लेखन -

                                    अनिलजीक जन्म २७ नवम्बर ‍१९५० ई॰ कऽ मधुबनी जिलाक सलमपुर (शंभुआर, भिट्ठी – सलमपुर, कैंटोला चौकक लगीच) नामक गाममे एक टा वत्स गोत्रिय ब्राह्मण परिवारमे भेलन्हि । हुनक माएक नाँव स्व॰ कर्पूरा देवी आ बाबूजीक नाँव स्व॰ राम नारायण ठाकुर छलन्हि । अनिलजी ३ भाए आ ३ बहीन छलाह आ तीनू भाएमे अनिलजी सभसँ पैघ रहथि ।

छायाचित्र ०२ –
श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’जीक पिता
स्व॰ राम नारायण ठाकुरजी
 
छायाचित्र ०३ –
श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’जीक माता स्व॰ कर्पुरा देवी (कुर्सी पर बायाँ कात),
मौसी (कुर्सी पर दायाँ कात) आ मामी लोकनि (ठाढ़ भेलि) ।

                    अनिलजी नेनपनहि सँ बहुत मेधावी छात्र रहथि । हुनक प्रारम्भिक शिक्षा गामहि केर प्राथमिक विद्यालयमे भेलन्हि । तत्पश्चात माध्यमिक विद्यालय - भिट्ठी आ उच्च विद्यालय – पण्डौलक छात्र रहलाह । एहि समय धरि ओ अपन छोटका मामा श्री महेन्द्र कुमरजीसँ शिक्षाक क्षेत्रमे विशेष प्रभावित रहलाह । कहबाक लेल दुनु माम आ भागिन रहथि पर समवयस होयबाक कारण संगी रहथि । मामा पढ़ाईमे एक वा दू बरष सिनियर रहथिन्ह । ओहि समय अनिलजीक छोटका मामा मैथिलीमे किर्तन शैलीक एक – आध दर्जन गीतक रचना कएने रहथिन्ह । मामाक इएह गीत सभ अनिलजीकेँ पहिले – पहिल गीत लिखबा दिशि आकर्षित कएलकन्हि आ किर्तन शैलीक बहुत रास गीतक रचना कएलन्हि । जेना कि,

भरल सभामे आबि जनकजी,
प्रण कएने छथि भारी हे ।
जे केओ धनुष उठा कऽ तोड़ता,
तनिके देबनि कुमारी हे ।।

आओर,

गौरी लीला बिहारी तोहर भंगिया ।
तोहर भंगिया हे,  तोहर भंगिया ।।

                            एहि बीच स्व॰ काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’जीक गीत सभ सेहो हुनिका प्रभावित कएलकन्हि । हुनक छोटका मामा आ मधुपजी – दुहु गोटे भनिता मे अप्पन नाँव दैत छलाह तेँ ओ मधुपजीक सदृश अपन एकटा काव्य नाँव “अनिल केर सृजन कएलन्हि । ओहो अप्पन शुरुआती गीत सभक भनितामे अप्पन नाँओ जोड़ए लगलाह ।

कहथि ‘अनिल’,
सुनु-सुनु हे मनाइनि ।
धीया अहाँकेर,
छथि जगतारणि ।    


भनहि ‘अनिल’ धनि धरू प्रिय धीर ।
खट् - मधु  लागत  विरहक  पीड़ ।

                           मधुपजीक काव्यसँ प्रेरित भऽ अनिलजी सेहो हिन्दी फिल्मक धुनि पर किछु गीतक रचना कएलन्हि पर से स्वयंकेँ बेस रूचलन्हि नञि । एहि बीच माम – भागिनक जोड़ी सेहो टूटि गेलन्हि । छोटका मामा सी॰ एम॰ साईन्स कॉलेज, दरिभंगा छलि गेलाह जतऽ हुनक काव्य प्रतिभाक अन्त भऽ गेलन्हि । भागिन अर्थात् अनिलजी आर॰ के॰ कॉलेज, मधुबनी चलि गेलाह जाहि ठामसँ ओ प्री-युनिवर्सीटी आ बी॰एस॰सी॰-प्रथम भागक पढ़ाई पुर्ण कएलन्हि । एहि ठामक विद्यापति स्मृति पर्व समारोह हुनिका विशेष आकर्षित कएलकन्हि आ मोनमे मञ्च पर स्वयंकेँ देखबाक लालसा प्रबल होमए लगलन्हि ।
 
छायाचित्र ०४ – बायाँसँ दायाँ –
श्री रतीश चन्द्र ठाकुर ‘रतनजी’ (अनिलजीक सभसँ छोट भाए), श्री सतीश चन्द्र ठाकुर ‘लल्लनजी’ (अनिलजीक माँझिल भाए), श्री कृष्णकान्त झाजी (अनिलजीक छोटका बहिनोइ), स्वयं ‘अनिल’जी आ पवनजी (अनिलजीक भागिन) ।
छायाचित्र ०५ – बायाँसँ दहिना –
श्रीमति बच्ची देवी (अनिलजीक धर्मपत्नी), श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’, श्रीमति सुष्मा देवी (अनिलजीक छोटकी मामी), श्री महेन्द्र कुमर (अनिलजीक छोटका मामा) – सन् ‍१९९६-९७ ई॰क छायाचित्र

छायाचित्र ०६ – 
श्री अनिलजी – अपन छोटका मामा ‘श्री महेन्द्र कुमर’जीक संग 
(सन् ‍१९९६-९७ ई॰क छायाचित्र)

                             एहि बीच श्री (डॉ॰) राधाकान्त ‘रमण’जीक गीत संग्रह “एक आँखि गंगा पढ़बाक अवसरि हाथ लगलन्हि (डॉ॰ रमणजी बादमे दरिभंगा आयुर्वेद महाविद्यालयमे लेक्चरर भेलाह) । एहि संग्रहक निम्न गीतक शब्द अनिलजीकेँ बहुत प्रभावित कएलकन्हि –

अहाँ केर इजोरिया कहाँ हम मँगै छी ।
अन्हारहुमे  हमरो  जिबऽ तऽ दियऽ ।।

                              एहि बीच मामा गाम रुचौलक (दुलारपुर-रुचौल) पुस्तकालयमे स्व॰ हरिमोहन झाजीक “चर्चरी” पढ़बा लेल भेटलन्हि । एहि किताबक भाषा ओ प्रस्तुति अनिलजीकेँ बड्ड आकर्षक लगलन्हि । ई युग छल श्री रबिन्द्रनाथ ठाकुरजीक । संयोगसँ जमसममे (महेन्द्रजीक पैत्रिक गाम) स्व॰ महेन्द्र झाजीक स्वरमे श्री रबीन्द्रजीक लीखल गीत अनिलजीकेँ सुनबाक मौका भेटलन्हि । ई गीत सभ मधुपजीक गीत सभसँ सर्वथा भिन्न छल, स्वतन्त्र छल आ आत्मनिर्भर छल । मतलब कि कोनहु फिल्मी धुनि पर आधारित नञि छल । तकरा बादो गीतसभ अत्यन्त प्रभावशाली आ आकर्षक छल । ओ निश्चय कएलन्हि जे गीत फिल्मी धुनि पर नञि लिखब । आभास भेलन्हि जे मैथिली मात्र श्रृंगार रसमे लिखबाक भाषा वा किर्तनिञा गीतक भाषा नञि छी । आ अनिलजी शिंगारक अतिरिक्त आन बहुत रास विषयसभ पर लिखए लगलाह ।

युग कहैत अछि, हम ने कहैत छी
अपना  जिनगीक अहीं छी मालिक
चाहे अपने जेना रही ।।

दू – तीन बाउ सँ घर बसाउ
बेशी ले मन  नञि  ललचाउ
अपने हाथ लगाम अहाँक अछि,
चाहे अपने जेना उड़ी ।।

                            श्रृंगारिक गीत तऽ लिखबे कएलन्हि, संगहि लिखलन्हि मिथिलाक दुरावस्था पर, समाजक कुव्यवस्था पर आ देशक अव्यवस्था पर । मातृभक्ति गीत लिखलन्हि, देशभक्ति गीत लिखलन्हि –

आँखि मे चित्र हो  मैथिली  केर,
आ  हृदय  मे  माटिक  ममता ।
माएक सेवा मे  जीवन बिता दी,
बस इएह एकटा होइए सिहन्ता ।।

                       भूख सभसँ पैघ श्राप (अभिषाप) थिक । ओ मनुक्खकेँ बहुत किछु एहनो करबा पर मजबूर कऽ दैत अछि, जे ओ नञि करए चाहैत अछि । जकर खेत सभ भरना लागल हो, रहबाक लेल माथ पर खढ़ नञि हो, काटए जोग भेल जजाति खेतहिमे लागल बिका जाइत हो, घऽरक जिम्मेदारी मूँह बओने ठाढ़ हो – तकर आदर्शक मुल्य की आ की ओकर अभिलाषा ??? भूखक आगाँ मनुक्खक बहुतो आदर्श दम तोड़ि दैत अछि । आ तेँ अपना बियाहक बाद कतेको साल फेर नञि लिखि सकलाह –

हे मिथिला केर भाग्य विधाता, नारा आइ बुलन्द करू ।
चाही जँ उद्धार मैथिलिक,  तिलक-प्रथा केँ बन्द करू ।।

                      कहुखन–कहुखन, किनको–किनको बुझि पड़ैत छन्हि कि अनिलजीक गीतसभ कोनो विशिष्ट राजनैतिक विचारधाराक सम्वाहक  वा सम्पोषक थिक । से पाठकक अपन सोच । अनिलजी राजनैतिक गतिविधिसभसँ प्रायः दूरे रहै बला लोक । हाँ बहुतो ठाम हुनक गीत हुनक जिनगीक संघर्षकेँ जरूर रेखांकित करैत अछि । यथार्थमे गरीबी ककरो जाति आ धर्म देखि कऽ नञि अबैत अछि । बाबूजी विशुद्ध कृषक ओ भुतपुर्व स्वतन्त्रता सेनानी (पेन्शनरहित) आ तेँ घरक प्रारम्भिक आर्थिक स्थिति अत्यन्त दयनीय । खेत सभ भरना लागल आ मूँह पर जाबी । एहेनमे लेखनी तऽ इएह लिखत –

छै  जेबी  जकर  खाली – खाली,
आ  खरची  घरक   लटपटायल,
से  फगुआ खेलायत कोना कऽ ।
जकरा आङन वसन्त नहि आयल,
से फगुआ  खेलायत कोना कऽ ।।

या फेर,
काल्हि केर भारत मे चाही ई घोषणा,
ई धरती हो तकरे, चुआबय जे घाम ।
बौआ दुनु हाथ जोड़ि करू ,
अइ माटि केँ प्रणाम ।।

                                      रामकृष्ण महाविद्यालयक मञ्च पर गाबि तऽ नञि सकलाह, कारण साजक संग गएबामे असुविधा होन्हि परञ्च हिनक गीत गाम-घरक विधि-बेबहारसँ लऽ कऽ मैथिलीक समस्त मञ्च पर सुशोभित भेल आ श्रोतालोकनिक प्रशंसा पओलक । मञ्च पर हिनक गीतसभकेँ पहुँचएबाक मुख्य श्रेय श्री शशिकान्तजी आ श्री सुधाकान्तजीक जोड़ीकेँ छन्हि । एकर अतिरिक्त श्री महादेव ठाकुरजी, श्री सुरेश पंकजजी, श्री सुरेन्द्र यादवजी, श्रीमति पुष्पाजी आ स्व॰ नूतनजी आदि आन बहुत रास समकालीन आ बादक गायक–गायिका लोकनिक स्वर हिनक गीतसभकेँ भेटलन्हि । मैथिलीमे लिखबाक लेल अनिलजीकेँ हुनक मँझिला मामा श्री देवेन्द्र कुमरजी (अध्यापक आ बादमे प्रधानाध्यापक, रहिका उच्च विद्यालयसँ सेवानिवृत्त) आ हुनक बाबा स्व॰ अनन्तलाल ठाकुरजीसँ सेहो बेस प्रोत्साहन भेटलन्हि ।

छायाचित्र ०७ –
श्री देवेन्द्र कुमर (पुर्व प्रधानाध्यापक, उच्च विद्यालय, रहिका, मधुबनी)
- अनिलजीक मँझिला मामाजी


कथा लेखन आ रेडियो स्टेशन

                    अकाशवाणी अर्थात् रेडियो – ओहि समयक एकटा अति सशक्त प्रसारण माध्यम छल – दूरदर्शनसँ सेहो बड्ड सशक्त । हर रचनाकार आ गायक – गायिका केर हृदयमे ई इच्छा अवश्य रहैत छल जे कम सँ कम एक बेर रेडियो स्टेशन पर मौका भेटओ । अनिलजीक मोनमे सेहो ई उत्कण्ठा होयब स्वभाविके । चर्चरी पढ़लाक बाद कथा लेखनक इच्छा जागृत भेले रहन्हि, कथा लीखि डाक द्वारा रेडियो स्टेशन पठाए देलन्हि । मुदा कथा आपिस आबि गेल । फेर दोसर कथा पठओलन्हि, पर ई की – ओहो आपिस आबि गेल (दुर्भाग्यसँ ई दुहु कथा आब नहिञे अनिलजी लग छन्हि आ नहिञे कथाक नाँव याद छन्हि) । पर ई हुनिका हतोत्साहित नञि कएलक अपितु आओरो नीक लिखबाक लेल प्रेरित कएलक । फेरो एकटा कथा लिखलन्हि । लिखलाक बाद ई कथा आर॰ के॰ कॉलेजमे श्री बुद्धिधारी सिंह रमाकरजीकेँ देखओलन्हि आ हुनक बताओल किछु संशोधन कएलाक बाद डाकसँ पठाए देलन्हि । ई कथा स्वीकार कऽ लेल गेल । स्विकृति पत्रक संगहि बादमे (प्रसारणक बाद) २५ रू॰ केर चेक सेहो डाकसँ भेटलन्हि । कथा वाचन लेल हुनिका रेडियो स्टेशन बजाओल नञि गेल पर श्री छत्रानन्द सिंह झा बटुक भाईजीक स्वरमे हुनक कथा प्रसारित आ पुनर्प्रसारित भेल । ई बात ‍१९६८ ई॰क अछि । कथाक नाँव छल मोन अछि एखन धरि सासुरक यात्रा

छायाचित्र ०८ –
काश्मीरक डल झीलक सोझाँ ‘अनिलजी’ - ‍१९७० ई॰मे तिरहुत कृषि महाविद्यालयक दिशिसँ आयोजित शैक्षणिक भ्रमणमे

                   तत्पश्चात बी॰एस॰सी॰-कृषिक पढ़ाई केर लेल अनिलजी आर॰के॰कॉलेज सँ तिरहुत कृषि महाविद्यालय, ढोली आबि गेलाह । फेर एक गोट कथा रेडियो स्टेशनकेँ प्रेषित कएलन्हि, स्विकृतो भेलन्हि पर वाचन हेतु आमण्त्रन नञि अएलन्हि । बात ‍१९७० ई॰ केर अछि । एक दिन बिनु बजओनहि अनिलजी पटना रेडियो स्टेशन पहुँचि गेलाह आ ओहि ठाम हुनक भेंट श्री गंगेश गुञ्जनजी आ श्रीमति प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम’जीसँ भेलन्हि । श्री गंगेश गुञ्जनजीकेँ कथा देखओलन्हि । कथाक नाँव छल इण्टरभल । गंगेश गुञ्जनजी कथाक अंग्रेजी शब्दसभकेँ उपयुक्त मैथिली शब्दसभसँ बदलि देलन्हि आ कथाक शिर्षक सुझओलन्हि धारक ओइ पार । कथा इएह नाँवसँ लेखकक अप्पन आवाजमे प्रसारित भेल । ओना बहुत बादमे एहि नाँवसँ हुनक एक गोट दीर्घ-कविता सेहो प्रकाशित भेल पर तकर एहि कथासँ कोनहु सम्बन्ध नञि अछि । बादमे हिनक एकटा आओर कथा प्रश्नवाचक चिन्ह मिथिला मिहिरमे प्रकाशित भेल । परञ्च गीतक लोकप्रियता आ काजक व्यस्तता हिनका कथा-लेखनसँ दूर कऽ देलक ।

छायाचित्र ‍०९ –
‘धारक ओइ पार’ नामक पोथीक (मैथिली दीर्घ कविता) मुखपृष्ठ



नौकरी-चाकरी आ मैथिली-हिन्दी -

               जाहि समय अनिलजी बी॰एस॰सी॰-कृषिक पढ़ाई लेल गेल रहथि ताहि दिनमे एहि डिग्रीकेँ सरकारी नओकरीक गारण्टी मानल जाइत छल । पर पढ़ाई पुरा करैत-करैत समय बदलि गेल रहै । किछु दिन बेरोजगारीक मजा लेबए पड़लन्हि आ गाबए पड़लन्हि –

मोटका मोटका पोथी पढ़लौं
पोथी केर सभ पन्ना रटलौं
से सभ रटिकऽ किछु नै भेल ।
पहिने जोड़ी जोड़ दशमलव
आब जोड़ै छी नून आ तेल ।।    

छायाचित्र १० –
अपन धर्मपत्नी श्रीमति बच्ची देवीक संग ‘अनिलजी’
 (सन् ‍१९८७ ई॰क आस-पासक छायाचित्र);
पाछाँमे अनिलजीक सभसँ छोट भाए श्री रतीश चन्द्र ठाकुर ‘रतनजी’

                       एहि बीच २ जुलाई ‍१९७१ ई॰ कऽ अनिलजीक बियाह लदारी गामक श्री चुल्हाई ठाकुरक सुपुत्री श्रीमति बच्ची देवीक संग भऽ गेलन्हि । ओहि समय ओ स्नातक-कृषि द्वितीय वर्षक छात्र रहथि । स्त्रीगणक समवेत स्वर कर्णगोचर होमए लगलन्हि –

नहुँ नहुँ चलियौ दुल्हा
जोर सँ ने चलियौ
एखने सँ कनियाँ केर
हाथ ने छोड़ियौ
धरा दियनु हे ससुर अङना मे ।
घुमा दियनु हे ससुर अङना मे ।।

              बियाहक प्रसंग अछि तऽ हुनक एक गोट गीत फेर याद आयल । गीतक कोनो सम्बन्ध ओना हुनक बियाह सँ नञि छन्हि । पर प्रसंगवश ई चहटगर गीत मोन पड़ल । ई गीत वास्तवमे गामक सलमपुरक गबैयाजी(श्री राजेन्द्र ठाकुरजी) टोलीक एक गोट नटुआ (श्री राजकुमारजी) आ जोकर (नाँव-?) विशेष आग्रह पर लिखल गेल छल । अनिलजीसँ हुनक शिकायत छलन्हि जे बाँकी लोकसभक लेल तँऽ ओ बहुत रास लिखए छथि, किछु गीत हुनको सभ लेल लिखल जाए । आ ताही फरमाइशकेँ ध्यानमे राखि ई गीत लिखल गेल छल  –

वाईफ बैजन्तीमाला, हम अपने राजेन्द्र कुमार ।
महमुदबा हम्मर चेला, जॉनी वाकर हमर भजार ।।

मोहम्मद रफीकेँ हमहीं,
सा-रे-ग-म सिखओने छी ।
मुकेशकेँ हमहीं,
भट्ठा धरओने छी ।
आगाँ – पाछा करैए, नन्दा केर फिएट कार ।
महमुदबा हम्मर चेला, जॉनी वाकर हमर भजार ।।

                   १० दिसम्बर ‍१९७५ ई॰ कऽ सेण्ट्रल बैंक ऑफ इण्डियामे कार्यभार ग्रहण कएलन्हि तथा नवम्बर २०१० मे अग्रणी जिला प्रबन्धकक पदसँ सेवानिवृत्त भेलाह । एहि क्रममे ओ बिहार, छत्तीसगढ़ आ मध्य प्रदेशक विभिन्न स्थान पर विभिन्न पद पर काज कएलन्हि । बिहारमे बसन्तपुर, अदापुर आ सीवान मे रहलाह आ प्रायः मैथिलीएमे साहित्य सृजन कएलन्हि । सीवानमे २-३ वर्ष विद्यापति पर्व समारोहक आयोजन सेहो कएलन्हि जाहिमे डॉ॰ बी॰ एल॰ दासजीक सहयोग उल्लेखनीय रहलन्हि ।

छायाचित्र ‍११ –
सन् ‍१९७५ ई॰क आस-पासक समय आ ‘अनिलजी’

                   छत्तीसगढ़मे बिलासपुर, डोमन हिल कॉलियरी, चिरमिरी आ कोतमामे तथा मध्य प्रदेशमे जबलपुरमे काज कएलन्हि । एहि सभ स्थान पर हिनक मैथिली साहित्य सृजन बहुत शिथिल रहल । हिन्दीक वातावरण छल आ अनिलजी ओकरहि धारमे भँसियाइत रहलाह । मैथिलीकेँ निश्चित रूपेँ क्षति भेल । एतहि हिनक हिन्दी गजल संग्रह तिरंगे के लिए (सन् ‍१९९७ ई॰मे) आ मैथिली दीर्घ कविता धारक ओइ पार (सन् ‍१९९९ ई॰मे) प्रकाशित भेलन्हि ।

छायाचित्र ‍१२ –
अमरकण्टकमे
 (छत्तीसगढ़मे) अपन धर्मपत्नीक संग झरनाक आनन्द लैत ‘अनिलजी’ 

अन्तर्जाल युग आ गजल लेखन -

               सेवानिवृत्तिक पश्चात अनिलजीक प्रवेश इण्टरनेट युगक मैथिली साहित्यकारक टोलीमे भेलन्हि । जालवृत्त पर ओ विदेह नामक मैथिली ई पत्रिकाक सम्पर्क मे अएलाह । एहि ठाम हुनक परिचय मैथिलीक प्रशिद्ध गजल लेखक श्री आशीष अनचिन्हारजीसँ भेलन्हि । हुनकहि सम्पर्कमे ओ गजल दिशि अग्रसर भेलाह आ आइ-काल्हि बेसी गजले लीखि रहल छथि । गजल गंगा नामक हुनक अप्रकाशित गजल संग्रह (जे कि अनचिन्हार आखर ब्लॉग पर उपलब्ध अछि) मे हुनक कुल ८१ टा गजल संग्रहित अछि जाहिमेसँ पहिल ६१ टा गजल सरल वार्णिक बहरमे (भाग - ‍१) अछि आ शेष २० गोट गजल अरबी बहरमे (भाग - ‍२)  अछि । एहि गजल संग्रहक पृष्ठ ८ पर स्वयं अनिलजीक उक्ति छन्हि जे पहिल भागक अधिकांश गजल सभ मिथिला मिहिर ……………….. विदेह-ई पत्रिका मे प्रकाशित गजल सबहक संशोधित रूप अछि । एहिसँ ई भ्रम उत्पन्न होइत अछि कि अनिलजी बहुत पहिनेसँ गजल लिखैत छथि । पर वास्तवमे ई संशोधित रूप की छी – ताहि पर विचार करब परमावश्यक । गजल गंगाक भाग - ‍१ मे संकलित अधिकांश तथाकथित गजलसभ पहिने विभिन्न पत्र – पत्रिकासभमे गीत वा कविताक रूपमे प्रकाशित भेल अछि । एतबहि नञि बहुत रचनासभ तऽ गीतक रूपमे कतोक मञ्चसभसँ बहुतो बेर गाओल गेल अछि । आइ ओएह गीत आ कविता सभकेँ मात्रादि मे कतिपय एम्हर – ओम्हर कऽ कऽ छन्द-बहर बना गजलक फ्रेममे कसि पुनर्सङ्कलित कयल गेल अछि ।

होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो ।
बन जाओ मीत मेरे, मेरा प्रीत अमर कर दो ।।

              श्री इन्दीवरजीक लिखल आ श्री जगजीत सिंहजी द्वारा हिन्दी फिल्ममे गाओल उपरोक्त गजल कतेक गीत छल आ कतेक गजल से तऽ ओएह लोकनि जानथि । पर किछु बात निर्विवाद रूपेँ सभकेँ बूझल अछि – पहिल ई जे इन्दीवरजी गीतकार रहथि आ दोसर जे जगजीत सिंहजी गजल गायक । जँ उपरोक्त पद्य गजल अछि तऽ ओहिमे ई गीतशब्द की कऽ रहल अछि ।

               हमर व्यक्तिगत मानब अछि (जरूरी नञि जे बाँकी लोक एहिसँ सहमति होथि) जे साहित्यमे दुइए टा समूह अछि – गद्य आ पद्य । जँ पद्य गाओल जा सकैत अछि तऽ ओ गीत भेल । आ इएह गीतक एक विशिष्ट प्रकार गजल थिक । जँ अनिलजीक उपरोक्त तथाकथित गीत सभकेँ गजल कहल जाइत अछि तऽ हमर एहि अवधारणाकेँ पुर्ण रूपसँ समर्थन भेटैछ । मैथिलीमे हुनिका द्वारा बादमे लिखल आ सद्यः लिखल गजल निश्चित रूपसँ गजल अछि । ओना हिन्दी मे गजल ओ बहुत पहिनहिसँ लिखैत छथि आ एक गोट हिन्दी गजल संग्रह तिरंगे के लिए सन् ‍१९९७ ई॰ मे प्रकाशित भेल छल । ओहि समयक नवोदित हिन्दी गजलकार श्री दुष्यन्त कुमारजीक गजल अनिलजीकेँ विशेष रूचिकर लगैत छलन्हि आ सम्भवतः हुनकहि गजलसभ अनिलजीकेँ गजल लिखबाक हेतु प्रेरित कएलकन्हि । ताहि समयक अपन परिवेशक अनुसारेँ प्रारम्भिक बेशी गजल ओ हिन्दीएमे लिखलन्हि आ छिट-पुट मैथिलीमे लिखलाह । पर बाद मे विदेह – मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका आ श्री आशीष अनचिन्हारजीक संगति मैथिलीमे हिनक गजल लेखनकेँ गति प्रदान कएलकन्हि ।

             हम गजलकार नञि छी, आ हमरा गजलक सम्बन्धमे बेशी नञि बुझल अछि पर गजलक सम्बन्धमे अनिलजीक निम्न वक्तव्य (जे पुर्वोत्तर मैथिल, जुलाई-सितम्बर २०१४, अंक-३१ मे छपल छल) अवश्य विचारनीय अछि –

बहरक झंझटि सँ, हमरा आजाद करू ।
हम गजल छी, हमरा नञि बर्बाद करू ।।

पोथी प्रकाशन -

               अनिलजीक पहिल प्रकाशित पोथी मैथिली गीत संग्रह तोरा अङना मे छल । ई २२ नवम्बर १९७८ ई॰ कऽ मुरलीधर प्रेस पटनासँ प्रकाशित भेल । एहिमे कुल ३१ टा गीत छल आ पछिला मुखपृष्ठ पर आशिर्वचन स्व॰ हरिमोहन झाजीक छल । एहि संग्रहक प्रायः सभ गीत अति लोकप्रिय भेल । एकर दोसर पुनर्मुद्रण ३ नवम्बर ‍१९८७ ई॰ कऽ उर्वशी प्रकाशन पटनासँ भेल । एहि बीच मुरलीधर प्रेस सँ एक गोट गीत संग्रह गीतक फुलबारी प्रकाशित भेल जाहिमे तोरा अङना मे”  गीत संग्रहसँ २४ टा गीत लेल गेल छल । बादमे गीतक फुलबारीक सेहो दोसर संस्करण बहार भेल ।

छायाचित्र ‍१३ –
‘तोरा अङना मे’ गीत संग्रहक पहिल संस्करणक मुखपृष्ठ

                    जेना कि ऊपर लीखि चुकल छी जे सन् ‍१९९७ ई॰मे हिन्दी गजल संग्रह तिरंगे के लिए आ सन् ‍१९९९ ई॰मे मैथिली दीर्घ कविता धारक ओइ पार प्रकाशित भेलन्हि । एहि बीच चारि टा गीत संग्रह केर पाण्डुलिपि उर्वशी प्रकाशनक स्व॰ गोपीकान्त बाबूकेँ प्रकाशनार्थ देल गेलन्हि । एहि गीत संग्रह सभक नाँव छल - ‍(१) मैथिलीक प्रतिमा सजाउ, (२) आँखि मे चित्र हो मैथिली केर, (३) हमर गामक चौक पर आ (४) होटल के मजा लियऽ । प्रत्येकमे प्रायः ३१ – ३६ टा गीत छल । पर किछु कारणवश ई सभ प्रकाशित नञि भऽ सकल । बादमे एहि चारू पोथीमेसँ किछु गीतकेँ गीत अनिलक नाँव सँ प्रकाशित करएबाक योजना भेल पर नौकरी मे भऽ रहल अत्यधिक स्थानान्तरणक कारण आ माए – बाबूक क्रमशः खराब स्वास्थ्यक कारण से सम्भव नञि भऽ सकल । पाण्डुलिपि आपिस लऽ लेल गेल पर स्थानान्तरण आ प्रवासक क्रममे क्षतिग्रस्त भऽ गेल । बादमे एहि गीत सभकेँ स्मृतिक आधार पर आ आन विभिन्न श्रोतसभसँ पुनः प्राप्त कएल गेल । ताहि कारणेँ कतिपय स्थान पर पुर्वलिखित आखर सभ किछु परिवर्तित भऽ गेल ।

छायाचित्र ‍१४ –
‘तोरा अङना मे’ गीत संग्रहक दोसर संस्करणक मुखपृष्ठ

              उपरोक्त चारू अप्रकाशित गीत संग्रहसभक किछु गीत आ किछु नऽव गीतकेँ संग लऽ एक गोट नऽव गीत संग्रह गीत गंगा सन् २०१३ ई॰मे शेखर प्रकाशन, पटनासँ प्रकाशित भेल । एहिमे ८० गोट गीत आ आत्मगीत”  नामक एक गोट अति दीर्घ गीत संकलित अछि । ई आत्मगीतवास्तवमे ४-५ अनुच्छेदक एक गीत छल जकरा बहुत बादमे एतेक बृहत स्वरूप देल गेल । आत्मगीत”  गीत गंगामे छपबासँ पहिने धारवाहिक रूपमे अंतिका नामक मैथिली पत्रिकामे छपब शुरू भेल छल पर एक-दू धारावाहिक छपि कऽ रुकि गेल । तत्पश्चात विदेह नामक मैथिली ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूप मे छपल ।  उपरोक्त चारू अप्रकाशित गीत संग्रहसभक किछु गीत गजल गंगा नामक अप्रकाशित मैथिली गजल संग्रहमे (जकर चर्च हम पहिने कऽ चुकल छी) सेहो देखबा मे आयल अछि । ई आत्मगीत वस्तुतः लेखकक अप्पन जिनगीक तीत आ मीठ अनुभवसभ पर आधारित अछि । एहिमे हुनक अपन सोच आ विचारधारा सेहो स्पष्ट रूपेँ ईंगित अछि । अनिलजी एखन किछु पुरणा (विभिन्न पत्र पत्रिकामे प्रकाशित कविता सभ) आ किछु नवका अप्रकाशित कविता सभकेँ मिला-जुला एक गोट नऽव काव्य संग्रह काव्य गंगा सेहो छपएबाक उपक्रममे लागल छथि ।

छायाचित्र ‍१५ –
‘गीत गंगा’ गीत संग्रहक पहिल संस्करणक मुखपृष्ठ

              हिनक मैथिली रचना सभ वैदेही, मिथिला टाइम्स, मिथिला मिहिर, भारती मण्डन, समय साल, पुर्वोत्तर मैथिल, अंतिका, देशज, घर बाहर, सांध्य गोष्ठी, माटि पानि आ विदेह ई पत्रिकाक अतिरिक्त आन समकालीन मैथिली पत्र – पत्रिका सभमे छिड़आएल अछि । हिनक हिन्दी रचनासभ दैनिक भास्कर (बिलासपुर ), नव भारत ( बिलासपुर ), शुभतारिका ( अम्बाला छावनी ), नवनीत, हंस, वीणा, अक्षरा, समान्तर, सानुबंध, समकालीन भारतीय साहित्य, प्रयास, जर्जर कश्ती  आदिमे प्रकाशित अछि ।

                  अनिलजीक एक गोट एकांकी कोराँटी”, एक गोट नाटक अधपहरा आ एकटा संस्मरण एकटा छलाह नोनू कक्का अद्यावधि अप्रकाशित अछि । सम्प्रति ओ पटनामे रहि स्वतन्त्र लेखनमे संलग्न छथि । हुनक मैथिली ब्लॉग आँखि मे चित्र हो मैथिली केर आ हिन्दी ब्लॉग तिरंगे के लिए अन्तर्जाल पर उपलब्ध अछि । अन्तमे हुनक उक्ति जे ओ तोरा अङना मे गीत संग्रहक प्रथम संस्करणक भूमिका मे स्वयम् केर परिचय दैत लिखने रहथि –

ने कवि छी हम ने गीतकार
ने आलोचक ने लेखक छी ।
मानी तँऽ मानू, अपनहि सन
माँ मैथिलीक पद-सेवक छी ।।

छायाचित्र ‍१६ –
‘अनिलजी’क हिन्दीक गजल संग्रह ‘तिरंगे के लिए’ केर मुखपृष्ठ

                आशा अछि अनिलजीक आन बहुत रास गीत–गजल, कथा–पिहानी, नाटक–एकांकी आ संस्मरण–डायरी हमरा आ हमरा सन आन पाठक ओ श्रोतालोकनिकेँ भविष्यमे हुनक लेखनीसँ भेटतन्हि । आइ एतबहि ।।





30  APRIL 2015  कऽ (आ संशोधित प्रतिलिपि 11 MAY 2015 कऽ) प्रकाशनार्थ विदेह - पाक्षिक मैथिली ई पत्रिका केर सम्पादकीय कार्यालयकेँ प्रेषित ।


01  DECEMBER 2015  कऽ विदेह - पाक्षिक इण्टरनेट पत्रिकाक 191म अंकमे (वर्ष 08, मास 96, दिनांक - 01 दिसम्बर 2015 ) संस्मरणक रूपमे प्रकाशित ।





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