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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Tuesday, 8 May 2012

पद्य - ६४ - हए बसन्ती पवन, कने धीरे तोँ चल


हए बसन्ती पवन, कने धीरे तोँ चल
(गीत)




हए  बसन्ती  पवन !  कने  धीरे  तोँ  चल ।
कने धीरे तोँ चल
ने   मचा    हलचल ।
हए  बसन्ती  पवन !  कने  धीरे  तोँ  चल ।।

देखू कनइत अछि नगर - नगर,
सिसकैत     अछि     गाम ।
बनल      पावन      विदेह,
अपनहि     केर     गुलाम ।
हे,  सुन,  सुन गे सरित !
ने तोँ कर  छल-छल
हए  बसन्ती  पवन !  कने  धीरे  तोँ  चल ।।

पुज्य   जनकक   ई   धरती,
मशान     बनल     अछि ।
लोक   रहितहुँ    जेना    ई,
विरान     बनल     अछि ।
सुन  गे  कोयली  कने !
ने  तोँ  गा  चञ्चल ।
हए  बसन्ती  पवन !  कने  धीरे  तोँ  चल ।।

जतए  गूँजय  छल  सदिखन,
विद्यापति     केर     गीत ।
आइ  नचइत  अछि   ताण्डव,
आ   गूँजैत   अछि   चीख ।
शस्य  श्यामल  ई  भूमि,
अछि बनल  मरूथल ।
हए  बसन्ती  पवन !  कने  धीरे  तोँ  चल ।।

उठू    मैथिल   युवक,
कहू   मैथिलीक  जय ।
होहु    आबहु    सतर्क,
करू   मैथिलीक  जय ।
फूँक  शंख   रे  मधुप !
चल  छोड़   शतदल ।
हए  बसन्ती  पवन !  कने  धीरे  तोँ  चल ।।





डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”                                
एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा                                   
कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टरनिगडी – प्राधिकरणपूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४



विदेह” पाक्षिक मैथिली इ  पत्रिकावर्ष मास ५२ , अंक ‍१०४ , ‍१५ अप्रिल २०१२ मे “स्तम्भ ३॰७” मे प्रकाशित ।





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