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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Monday, 25 January 2016

पद्य - ‍१४३ - उड़ीस (बाल कविता)

ड़ीस (बाल कविता)





कमला  माएकेँ  कहियो  ठकलन्हि   गोनू  बाबू ।
एक सए एक  उड़ीसक,  बलि  देल  गोनू  बाबू ।।*

बास ओकर पुरना पलंग, कुर्सी, चौकी आ खाटमे ।
रातिमे ओ चुटचुट काटए, दिन नुका रहैए फाटमे ।।

ओ मनुक्ख केर खून चूसि कऽ, अप्पन पेट भरैए ।
बदलामे कत’ रोगक संगहि, निन्नमे विघ्न करैए ।।*

तेँ जल्दीसँ करी  उपाए  आ  ओकरा झट उपटाबी ।
एहेन चौकी आ खाट पलंगकेँ, चट दऽ रौद लगाबी ।।*

तोसक, कम्मल, सीरक, सुजनी सभकेँ रौद देखाबी ।
चद्दरि तकिया-खोल आदिकेँ, पानिमे दऽ खौलाबी ।।

गऽह - फाट चौकी - पलंग केर, छीटी उचित दबाई ।
बौआ - बुच्ची  दूर  रही,  जँ छीटथि केओ दबाई ।।

तइयो जँ नञि बात बनए तँऽ अन्तिम करी प्रबन्ध ।
कमसँ कम छओ मास-बरष धरि, छोड़ू एहेन पलंग ।।*


संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - मिथिलाक प्रशिद्ध गोनू झाक खिस्सासँ उद्धृत ।

* - उड़ीस केर कटलासँ मनुक्खक रतुका निन्न तँऽ खड़ाब होइते अछि संग - संग त्वचा पर कटबाक निशान बनि जाइत अछि जे नोचए लगैत (ITCHING TENDENCY) अछि । नोचला पर (AFTER SCRATCHING) नऽह लगलासँ ओहि स्थानसभ पर घाओ आ द्वितीयक संक्रमणक (SECONDARY INFECTIONS) संभावना भऽ जाइत अछि । उड़ीसमे मनुक्खकेँ संक्रमित कए रोगग्रस्त करबाक क्षमता रखनिहार कम सँ कम २८ गोट परजीवी (PATHOGENS) पाओल जाइत अछि, जखनि कि एहि क्षेत्रमे एखन बहुत कम्मे काज भेल अछि ।

* - लकड़ीसँ बनल उपस्कर (फर्निचर) ओ बिछाओन आदिकेँ गर्म करब (तेज रौदमे आ जकरा सम्भव हो तकरा खौलैत पानिमे) आ सुखाएब सबसँ नीक घरेलू उपचार थिक । 45°C (113°F) पर एक घण्टा राखब वा -17°C (01°F) पर दू घण्टा राखब उड़ीसकेँ पुर्णतः समाप्त कऽ दैत अछि । पहिल तरीका अपनासभ दिशि गर्मीमे आ दोसर तरीका पहाड़क क्षेत्रमे सर्दीमे बेस प्रभावकारी अछि । जँ 50°°C (122°F) केर तापमान प्राप्त कएल जा सकए फर्निचर ओकरा सहन कऽ सकए तऽ मात्र दू मिनटमे पूरा उड़ीस उपटि जाइछ । चद्दरि आ वस्त्र आदिसँ उड़ीस उपटएबाक लेल आयरनक उपयोग कएल जा सकैछ । चुँकी रौदमे देला पर लकड़ीसँ बनल उपस्करक गऽह आ फाटमे उड़ीस नुका कऽ बचि जाइत अछि, तेँ ओहि ठामसँ ओकरा निकालबाक लेल उचित दबाई केँ गऽह आ फाटसभमे छीटलासँ  ई विधि बेशी प्रभावकारी सिद्ध होइछ । दबाई छिटबाक काज घरक कोनो पैघ आ बुझनुक सदस्य सावधानीपुर्वक करैत छथि कारण ई दबाई मनुक्खक साँस द्वारा या मूँह आ आँखिमे पड़लासँ मनुष्यक स्वास्थ्यकेँ सेहो गम्भीर हानि पहुँचा सकैत अछि । धियापुताकेँ एहि काजसँ दूर रहबाक चाही आ अनेरो हुलुक-बुलुक नञि करबाक चाही । कोनहु दुर्घटना भेला पर सीधे यथासिघ्र चिकित्सककेँ देखएबाक चाही ।

* - उड़ीस बिना किछु खएने - पिउने ‍100 सँ 300 दिन धरि रहि सकैत अछि । ई अवधि वातावरणक तापमान पर निर्भर करैछ । तेँ कोनहु खुला जगह पर बिना उपयोगक छओ महीना वा एक वर्ष धरि उड़ीस लागल लकड़ीक उपस्करकेँ छोड़ि देलासँ सेहो उड़ीसकेँ उपटाओल जा सकैछ ।



मैथिली पाक्षिक इण्टरनेट पत्रिका विदेह केर ‍194म अंक (‍15 जनबरी 2016) (वर्ष 9, मास 97, अंक ‍194) केर बालानां कृते स्तम्भमे प्रकाशित ।




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