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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Tuesday, 17 January 2012

पद्य - ३५ - मैथिलक प्रति बाबा विद्यापतिक उक्ति


बाबा विद्यापतिक कथन





रौ  मैथिल ! मैथिली  तोँ  बाज ।
केहेन  चिन्ता ? कथी केर लाज ?
हमहूँ  संस्कृतक  पण्डित, पर मैथिली  हम्मर माथक पाग ।।

मीठ  गीत, बहुते तोँ  सुनलह,
आइ सुनह मोर बोल कटाह ।
रोष ने  करिहऽ हमरा पर, जँ
हमर बोल,  लागह अधलाह ।
हमरो समय, बहुत पोंगा सभ,
बहुतहि थू – थू  कएने छल ।
मिथिलाभाषा लिखय छलहुँ तेँ,
हमरा, सभ धकिअओने छल ।
मिथिलाभाषा जेँ लिखलहुँ, तेँ तोँ सभ आइ करय छह याद ।
हमहूँ  संस्कृतक पण्डित, पर मैथिली  हम्मर माथक पाग ।।

हे मैथिल ! किछु ज्ञान सुनह,
हमर बात,  किछु कान धरह ।
अनका  सञो  हमरा नञि  द्वेष,
पर निज भाषा  किए  कलेश ।
पढ़ह – लिखह, जे मोन होअह,
पर निज भाषा  जुनि बिसरह ।
अनका लग भले किछु डाकह,
अपना   मे    मैथिली    बाजह ।
धिया – पुता केँ हीन ग्रस्त भऽ, वा मद मे जुनि देखबह लाथ ।
हमहूँ   संस्कृतक   पण्डित,  पर   मैथिली  हम्मर  माथक  पाग ।।

बाजह  सदिखन, सुनह मैथिली,
गुनह   मैथिली,  रटह मैथिली ।
रचह  मैथिली,  लीखह  मैथिली,
कीनि कऽ पोथी पढ़ह मैथिली ।
सृजन मैथिली, च्यवन मैथिली,
नाचह मैथिली, गाबह मैथिली ।
बाट   मैथिली,    घाट    मैथिली,
घर- बाहर, सभ ठाम मैथिली ।
तजि निज भाषा, कुकुरक गति हो, नञि घर केर, नञि धोबी घाट ।
हमहूँ  संस्कृतक  पण्डित,  पर   मैथिली  हम्मर  माथक  पाग ।।


"विदेह पाक्षिक मैथिली इ पत्रिका, वर्ष , मास ४९, अंक ९८, स्तम्भ – ३॰७,  दिनांक १५।०१।२०१२ मे प्रकाशित ।

3 comments:

  1. मैथिलि भाषा क समृद्धि क लेल अहाँक प्रयास प्रशंशनीय अछि

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  2. नीक कविता ।नीक बात ।बधाई ।

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  3. श्री कर्णजी आ श्री पाठकजी अपने दुहु गोटे केँ सादर धन्यवाद ।

    हर गोटे जे मैथिली केँ अप्पन भाषा बुझैत छथि - चाहे ओ हम होइ, चाहे हो अपने लोकनि होइ वा चाहे ओ केओ आओर होथि - मैथिली केर समृद्धि केर लेल प्रयासत छथि । आ जे नञि छथि हुनिका होइबाक चाहिअन्हि । जय मिथिला, जय मैथिली ।

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