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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Thursday, 15 September 2011

पद्य - ६ - बसात (हवा)

      बसात (हवा) 
      (बाल गीत)  





शिल्पकार छी एहि धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।
स्पर्श मात्र कए सकइत छी , निज  आँखि  सँ देखब सपने अछि ।।

ब्रम्हा बनि कखनहु  सृजन करय,
कहुखन  हर  रूप  कराल धरय ।
कहुखन  हरि  सम   पालनकर्त्ता,
कहुखन यम - सद्यः काल बनय ।
ओ जिनगी छी  एहि  धरती केर,
सभ जीवक साँस समाहित अछि ।
एहि  धरती पर  जे  रिक्त लगय,
ओहि शुन्यक बीच प्रवाहित अछि।
नञि  मूर्त  रूप  पओलक  कहियो, पर  दिव्य रूप संवरने  अछि ।
ओ शिल्पकार छी  एहि  धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।।

ओ योगवाहि,  की नञि बुझल ?
ओ  कऽ सकैछ  ककरो संगति ।
जकरा संग,  जा धरि मीत रहय,
तकरे  सन  गुण, तकरे रंगति ।
के नञि जनैछ  पुरिबा – पछिबा,
मलयक बसात के नञि जनइछ ।
ककरा  नञि  अनुभव  चक्रवात,
लू – जेठक  दुपहरिया  तपइत ।
अनल,  अनिल  केर  संग  पाबि, सोनक लंका  केँ  डहने  अछि ।
ओ शिल्पकार छी  एहि  धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।।

कत' विटप उखारल …………


कहुखन एकसरि सरिता  जल पर,
जनु  जलतरंग  ओ बजा  रहल ।
कखनहु  मरु मे  वा सागर  तट,
लीखि बालु सँ अपने  मेटा रहल ।
ओकरा  सोझाँ,  के रहल  अडिग,
बिनु दर्प – दलित, के रहल ठाढ़ ?
कत विटप उखाड़ल, सिन्धु मथित,
भासित  पहाड़,  अपचित  पठार ।
अगनित पाथर केँ काटि – छाँटि, कत रूप - अनूप ओ गढ़ने अछि ।
ओ शिल्पकार छी  एहि  धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।।








 विदेह  पाक्षिक मैथिली इ  पत्रिका, वर्ष   , मास  ४५ , अंक  ९०, ‍दिनांक - १५ सितंबर २०११ मे प्रकाशित ।



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