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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

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Tuesday, 16 May 2017

पद्य - २३८ - गिरगिट (बाल कविता)

गिरगिट (बाल कविता)






गिरगिट छेँ की ?
रंग बदलै छेँ खनें - खनें ।
गिरगिट केहेन ??
सोचए बच्चा मनें - मनें ।।*

वन-उपवन बाड़ी-झाड़ी, सभ ठाँ भेटैत अछि ।
ठण्ढीक भोरमे बैसल, ओ  रौदा  सेकैत अछि ।
घऽरमे  भेटैछ,
भेटैछ संगहि  रणे - बने ।*
गिरगिट छेँ की ?
रंग बदलै छेँ खनें - खनें ।।

पहिने रंग रहए जे चामक, चट दऽ बदलल ।
या रंगक विन्यास सकल, आमूलहि बदलल ।
देखि अचंभित,
चकित आँखि छै कने-कने ! *
गिरगिट छेँ की ?
रंग बदलै छेँ खनें - खनें ।।

गोहि आओर सनगोहि, भाए छी गिरगिट केर ।
मुदा पैघ ने, ओतेक  काय छी  गिरगिट केर ।
जीह निकालि कऽ,
पकड़ए कीड़ा क्षणें - क्षणें ।*
गिरगिट छेँ की ?
रंग बदलै छेँ खनें - खनें ।।





संकेत आ किछु रोचक तथ्य -

* - गिरगिट शब्दक अर्थ मैथिलीमे बहुत व्यापक अछि जे अपना आपमे सामान्य गिरगिट, ठिकठिकिआ / घरैया गिरगिट, गोहि, सनगोहि, डाइनोसॉर आदि सभकेँ समाहित करैत अछि । मैथिलीक गिरगिटक तुलना अंग्रेजीक LIZARD शब्दसँ कए सकैत छी जाहिमे COMMON GARDEN LIZARD, CHAMELEON आदि सभ आबैत अछि । गिरगिट शब्दसँ अमेरिकी महाद्वीपक  IGUANA नामक सरिसृपक केर सेहो बोध कहल जा सकैत अछि, हलाँकि ओ सामान्य गिरगिटसँ ओ बहुतहु बातमे भिन्न अछि । परिवेश वा इच्छानुसार चामक रंग बदलबाक गुण कमोबेश हर गिरगिटमे होइत अछि मुदा चमेलिओनाइडी / केमेलिओनाइडी कुल (Family - Chamaeleonidae; Eng. - Chameleons) केर गिरगिट सभमे ई गुण बहुत अधिक विकसित भेल अछि । चुँकि, मैथिलीमे ठिकठिकिआ, गोहि, सनगोहि आदि शब्द पुर्णतः परिभाषित अछि तेँ एकरा सभकेँ छोड़ि शेष सम्बन्धित प्राणीक लेल हम एहि ठाम गिरगिट शब्दक प्रयोग कएल अछि

* - सरिसृप वर्गक प्राणि होएबाक कारणेँ गिरगिट सेहो शीतरक्तीय प्राणी अछि आ तेँ ठण्ढीक समएमे भोरुका पहर रौद सेकैत आरामसँ देखल जा सकैत अछि ।

* - गिरगिट रंग बदलबामे माहिर होइत अछि । ओ अपन चामक रंग ओ रंगक विन्यास अपना आस - पासक परिवेशक अनुसार क्षण भरिमे बदलि लैत अछि । ओना तँऽ बहुत रास समुद्री जीवमे ई गुण पाओल जाइत अछि, मुदा धरती पर आ ओहो मनुक्खक आवास क्षेत्र केर आस - पास गिरगिटहि एहिमे सभसँ कुशल होइत अछि । जीव विज्ञानमे एहि तरहक घटनाकेँ छलावरण या छद्मावरण (CAMOUFLAGE) कहल जाइत अछि । ई छद्मावरण दू तरहेँ गिरगिटकेँ सुरक्षा प्रदान करेत हछि - पहिल तँऽ वातावरणक रंगमे स्वयंकेँ दुश्मनक नजरिसँ नुकाए लैत अछि आ दोसर आक्रामक रंग परिवर्तन कए प्रतिद्वन्दीकेँ डेराए दैत अछि ।

* - गिरगिटक जीह बेङ्ग जेकाँ होइत अछि आ मूँहसँ बाहर शिकार पर दागल जाइत अछि । जीह केर अगिला भाग शिकारकेँ अपन लसलस लेरमे सटाए मुँहक भीतर नेने जाइत अछि ।

क्र॰
सं॰
जीवक मैथिली नाम
अंग्रेजी नाम
विशिष्ट गुण
गिरगिट
LIZARDS (Including CHAMELEONS
& IGUANAS & OTHERS)
·        रंग बदलबामे कुशल
·        बहुतहु गिरगिटक जीहक संरचना कार्य-शैली बेङ्ग जेकाँ होइछ
ठिकठिकिआ
(ठिकठिकिया) / घरैया गिरगिट
COMMON HOUSE GECKOES / HOUSE LIZARDS
·        रंग बदलबामे बेसी कुशल नञि
·        खतरा पड़ला पर नाङ्गरिक पछिला भागक त्याग करैछ
गोहि
MONITOR LIZARDS  / VARANUSES (Including KOMODO DRAGONS)
·        साँप जेकाँ द्विभाजित जीह
·        गिरगिटसँ पैघ आकार
·        रंग बदलबाक गुण नञि
सनगोहि
GOLDEN / YELLOW MONITOR LIZARD
·        गोहि केर एक प्रकार
·        चामक रंग किछु पीताभ सनि होइछ आ अपना दिशि पाओल जाइछ


मैथिली पाक्षिक इण्टरनेट पत्रिका विदेह केर ‍225म अंक (‍01 मई 2017) (वर्ष 10, मास 113, अंक ‍225) केर बालानां कृते स्तम्भमे प्रकाशित ।



Tuesday, 25 April 2017

पद्य - २३७ - आइ आबए बला रिजल्ट छै (बाल कविता)

आइ आबए बला रिजल्ट छै (बाल कविता) 





आइ  आबए  बला  रिजल्ट छै ।
आइ  दिन  बड़ी डिफिकल्ट छै ।
की करियै - किछु  फुरा रहल ने,
आइ  ने  कोनो  विकल्प  छै ।।

जएह लिखलियै,  खूब लिखलियै ।
सभ पन्नाकेँ भरि - भरि देलियै ।
तइयो  आइ  बड़  डऽर   लगैए,
छपने   केहेन   रिजल्ट   छै !!

कोनो  चीजमे  मोन ने लागए ।
कछमछ मोन  उताहुल भागए ।
इण्टरनेट  अछि देखा रहल बस,
आबए  बला   रिजल्ट  छै ।।

कहुखन  मोनेँ  टॉप  करै छी ।
कहुखन सभसँ  फ्लॉप करै छी ।
आइ  तराजू  केर  पलड़ा सनि,
डगमग  दृढ़   संकल्प   छै ।।


30 JULY 2015 कऽ प्रकाशनार्थ मिथिला दर्शन केर सम्पादकीय कार्यालयकेँ प्रेषित ।
मैथिली पाक्षिक इण्टरनेट पत्रिका विदेह केर ‍224म अंक (‍15 अप्रील 2017) (वर्ष 10, मास 112, अंक ‍224) केर बालानां कृते स्तम्भमे प्रकाशित ।


पद्य - २३६ - छोट माँछ, पैघ माँछ (बाल कविता)

छोट माँछ, पैघ माँछ (बाल कविता)






छोट माँछ,  पैघ माँछ,  ताहूसँ  पैघ  माँछ,
कक्कर आहार के ? – बुझिते छी भाइ यौ ।
दुनिञाक  इएह  नियम,  सदिखनसँ आबैए,
बेसी हम की कहू - बुझिते छी  भाइ यौ ।।

जिनगी  संघर्ष  छिऐ,  सएह  आदर्श  छी,
विश्वक  विचित्र  संकल्पना छी  भाइ यौ ।
हर  कण  निर्जीव जे,  वा  हो  सजीव जे,
करइछ संघर्ष नित, अस्तित्वक, भाइ यौ ।।

मानी  ने  मानी अहँ,  संघर्षे  सत्य  छी,
शान्तिक विचार  बस सपना छी भाइ यौ ।
जतबा   प्रकृतिकेँ,   हमसब  जनैत  छी,
अस्तित्वक इएह  संकल्पना छी भाइ यौ ।।

जल थल बसात नभ, अस्तित्व लेल निज,
करइछ प्रयत्न नित, बुझले छी भाइ यौ ।
अपना अस्तित्वकेँ जञो नञि बचाए सकी,
सहअस्तित्व तखन सपना छी भाइ यौ ।।


मैथिली पाक्षिक इण्टरनेट पत्रिका विदेह केर ‍224म अंक (‍15 अप्रील 2017) (वर्ष 10, मास 112, अंक ‍224) केर बालानां कृते स्तम्भमे प्रकाशित ।





पद्य - २३५ - पटना पुस्तक मेला (बाल कविता)


पटना पुस्तक मेला (बाल कविता)

पटनाक पहिल पुस्तक मेलासँ किनल किछु सोवियत पोथीसभ - रादुगा, मीर ओ प्रगति प्रकाशनक पोथीसभ


आइ गेल छलहुँ  पुस्तक मेला,
पटनाक   गान्धी   मैदानमे ।
नञि विशेष किछु  छल तइयो,
नव  पोथीक  अनुसन्धानमे ।।

याद आबैछ  एखनहु  ओहिना,
पटनाक  पहिल पुस्तक मेला ।
पोथी  सभहक  अम्बार   बेस,
आ लोक सभक रेला - ठेला ।।

मीर,  रादुगा,  प्रगति प्रकाशन,
सोवियतक   पुस्तक  आगार ।
ऑक्सफोर्ड, प्रैण्टिस आ कैम्ब्रिज,
एन॰बी॰टी॰, सी॰एस॰आइ॰आर॰ ।।

हरेक विषय पर  छल  पुस्तक,
भाषा, इतिहास, भूगोल  रहए ।
अभियंत्रन, वाणिज्य, चिकित्सा,
ज्योतिष, धर्म, खगोल  रहए ।।

बहुबिध  देसी  आओर  बिदेसी,
पुस्तक   केर   स्टॉल  रहए ।
मैथिलीक  सेहो  एक - दू  टा,
नीक  छोट   स्टॉल   रहए ।।

सोचल    आगाँ   धीरे - धीरे,
मैथिलीक    स्टॉल    बढ़त ।
ई  तँऽ   पहिलुक  बेर  थिकै,
आगाँ  बढ़िञा माहौल  रहत ।।

एहनहु  बरख   रहल  जहिया,
छल नामहि केर पुस्तक मेला ।
पाटलीपुत्र    मैदान    फिरल,
भेल  दूसल्ला  पुस्तक मेला ।।

कतोक  प्रकाशन   बन्न  भेल,
अन्तर्जालक  ई  युग आएल ।
थिक  उदासीन  सरकार  सेहो,
राज्यक भाषा सभ बौआएल ।।

युवा ई मेला - चौबीस बरखक,
वृद्ध  सनक  लागैत  अछि ।
पुस्तक मेलाक  शिशु अवस्था,
याद  बहुत  आबैत  अछि ।।

2017 ई॰क पटना पुस्तक मेलामे मैथिली द्वार तँऽ छल मुदा मैथिली पोथीक स्टॉल नञि । शायद एही द्वार बाटे मैथिली पोथीसभ भागि गेल होयत !!!




मैथिली पाक्षिक इण्टरनेट पत्रिका विदेह केर ‍224म अंक (‍15 अप्रील 2017) (वर्ष 10, मास 112, अंक ‍224) केर बालानां कृते स्तम्भमे प्रकाशित ।