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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Sunday, 25 October 2015

पद्य - ‍१‍२‍५ - हम आ मैथिली (कविता)

हम आ मैथिली (कविता)




लोक कहैतछि, छी ब्राह्मण अहाँ,  तेँ  लीखि सकलहुँ  मैथिली ।
जएह बजैत छी, सएह लीखैत छी,  तेँ  लीखैत छी  मैथिली ।।

सुनू यौ  बाबू,  ब्राह्मण  भेने,  लीखि  ने  सकितहुँ  मैथिली ।
संस्कृत पढ़ितहुँ, हिन्दी छँटितहुँ, कोना कऽ लीखितहुँ मैथिली ।।

घऽर  अहाँ  केर  दरिभंगा  अछि,  तेँ  लीखैत  छी  मैथिली ।
दरिभंगा  रहितहुँ  छी प्रवासी,  बूझए ने  जाहि ठाँ  मैथिली ।।

माए - बाप  घुमितहि  रहलाह,   भारत  सरकारक  नौकरी ।
बदली भऽ  जाहि ठाँ रहलाह,  पर बजलन्हि घरमे  मैथिली ।।

पटनासँ  मैट्रिक  कएलहुँ,  लड़ि - झगड़ि कऽ  लेलहुँ मैथिली ।
नओमामे   नहिञे    भेंटल,   दसमामे   पढ़लहुँ   मैथिली ।।

दसमोमे   ईस्कूल   प्रशासन,   कहलक  राख  ने  मैथिली ।
रखबेँ  तँऽ  नञि  केओ  पढ़एतौ,  अपने  पढ़िहें   मैथिली ।।

माए  मैथिलीक  इच्छा,   हमसभ  राखल  तइयो   मैथिली ।
माए मैथिली  बनि  अध्यापिका,*  शिक्षा  देलन्हि  मैथिली ।।

अहाँ  कहब - दरभंगिया  बाभन,  शुद्ध  लीखी   तेँ  मैथिली ।
हम जनैत छी,  जेँ पढ़लहुँ,  तेँ  लीखि  पाबैत  छी मैथिली ।।

लीखबामे    मिथिलाभाषा    आ    लीखलकेँ     पढ़बामे ।
ओहने   हमरो  लेल  कठिन  छल,  डेग  पहिल  चलबामे ।।

मैथिली  जे  हम  बजैत  रही  आ  छल  साहित्यक  अलगे ।
पढ़ल - गुनल - लीखब  सीखल,  की  होयत  रहि  दरिभंगे ।।

मोनमे  ई  भ्रम्  जुनि  राखू,   ई  कपटी  सभक   प्रपञ्च ।
अपन   माएसँ   दूर   करक   छी,   दुष्टक   ई  षडयण्त्र ।।

जोधा - अकबर  केर  पुत्र  सलीमक, कथा सकल छी बूझले ।
डाहेँ  सलीमकेँ  हफीम  खोआए,  कएलक की रूकैया बूझले ।।

जे  ब्राह्मण  दरिभंगे  रहि  कऽ,  पढ़ल  ने  कहियो  मैथिली ।
लीखि  ने  सकत,  बाँचत  की  लीखल, सीखू बौआ मैथिली ।।

जाति  धर्म  ओ  डेग - डेग  पर,  जे  किछु  अलग  लगैए ।
से  बूझू,  ओहि  ठामक  बोलीक,   मधुर  सुगन्धि  आनैए ।।

जहिना  हिन्दी  अछि  एक्के,  पर  सभ-ठाँ  भिन्न  लगैए ।
बंगाली  -  बिहारी  -  मराठी  -  दिल्ली   अलग  बजैए ।।

तहिना  मैथिली  अछि  एक्के,  बेतियासँ  लऽ कऽ  बनैली ।
एक्के  तिरहुत,  तीरभुक्ति,  मिथिला,  विदेह  आ   बज्जी ।।

नञि  अनुचित  जँ  केओ  व्यक्ति,   भाषा  दू-चारि  जनैए ।
पर  अनुचित  ओ  मैथिल  जे,  मैथिलीसँ    मूँह   फेरैए ।।

दोसरोक  माए  अपनहि  छी  माए, यौ हमहूँ सएह बूझै छी ।
पर अनुचित  निज माएक  बलि दऽ,  अनका जँ जुड़बै छी ।।

हम  नञि  छी  भगवान - भगवती,  सांसारिक  छी  प्राणी ।
मैथिली  हम्मर  माएक  भाषा,  बस  एतबहि - टा  जानी ।।

विश्वक  सभ  भाषा  प्रिय  हमरा,   पर  निज  भाषा  नेह ।
एकर  अहित  जे  केओ  करैछ,  तकरासँ   हमरा  द्वेष ।।




* हमर विद्यालयमे २ सत्रमे (शिफ्टमे) पढ़ौनी छल । हम जाहि सेक्शनमे रही से प्रातः कालीन सत्रमे छल । ओहि विद्यालयमे मैट्रिकमे मैथिलीक लेल कोनहु शिक्षक/शिक्षिका नियुक्त नञि छलाह/छलीह । भरि नओमा संघर्ष कएलहुँ पर मैथिली नञि राखए देल गेल । दसमामे अएलाक बाद किछु सूत्रसभसँ पता चलल जे ओही विद्यालयमे अपरान्हकालीन सत्रमे +2 मे मैथिलीक पढ़ौनी लेल एक गोट शिक्षिका नियुक्त छथि, पर ओ भारतीय प्रशासनिक सेवाक परीक्षाक तैय्यारी लेल छुट्टी पर छथि । बहुत प्रयत्न कएलाक बाद हुनिकासँ भेंट भऽ सकल । ई भेंट आशातीत नञि अपितु आशासँ बेसी नीक रहल । मैथिलीक पढ़ौनी हेतु हुनक पुर्ण सहयोग भेटल, तत्कालीन विद्यालय प्रशासनक विरुद्ध जा ओ सहयोग कएलन्हि । ओहि सालक विभिन्न सेक्शनक आठ गोट विद्यार्थी (हमरा सहित) मैथिली रखलहुँ । हुनिक नाँव छलन्हि श्रीमति उषा ठाकुर (चौधरी) । बादमे ज्ञात भेल जे ओ भारतीय प्रशासनिक सेवामे चयनित भेलीह । बहुत बादमे ईहो पता चलल जे हुनिक सासुर दुलारपुर (हमरहि पञ्चायत) छलन्हि । पुनः भेंट करबाक इच्छा छल पर दुर्भाग्यवश से पूरा नञि भऽ सकल । हालहि मे जानकारी भेंटल जे कैन्सरक कारण अल्प वयसहिमे हुनिक देहावसान भऽ गेलन्हि । हुनिका सादर नमण । मैथिलीक सम्बन्धमे सम्पुर्ण विद्यालय यथाशक्ति असयोग कएलक । मात्र दू गोटे सहयोग कएलन्हि जनिक नाँव लेब उचित - पहिल श्रीमति गौरी गुप्ताजी (अर्थशास्त्रक शिक्षिका, स्वयं बाङ्ग्लाभाषी रहथि) आ दोसर श्रीमति वीणापानि सुधांशुजी (दसमाक अन्तिम किछु महिनाक समयमे हमर विद्यालयक प्रधानाध्यापिका) । हमर एहि विद्यालयक नाँव छल शहीद देवीपद चौधरी स्मारक ईण्टर स्तरीय विद्यालय, अदालतगञ्ज, पटना अथवा मिलर हाई स्कूल, पटना





मैथिली पाक्षिक इण्टरनेट पत्रिका विदेह केर ‍190म अंक (‍15 नवम्बर 2015) (वर्ष 8, मास 95, अंक ‍190) मे प्रकाशित ।




3 comments:

  1. I Still remember the days when we fought against the school management to let us opt for our mother tongue "Maithili"....finally we won and opted for this.

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  2. I really feel quite nostalgic by reading this poetry....

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  3. हाँ ! ओ दिन वास्तवमे किछु अलगहि छल ।

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