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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Sunday, 25 October 2015

पद्य - ‍१‍२‍७ - खैनी (कविता)

खैनी (कविता)



पहिलुक अलाप
खोआए देलक, हम खाइत कहाँ छी ।
बस चीखए छी, अभ्यस्त कहाँ छी ।
सबसबाइत  छल  दाँत,  तेँ  धएलहुँ,
एतबामे  किछु  गलत  कहाँ  छी ??

बिचला प्रलाप
एतेक बरख धरि केर आदति छी ।
छूटत  नञि,  छोड़ए  चाहैत छी ।
ओ तँऽ  कहियो  नहिञे  खएलक,
तइयो काँकोड़ * केर आफत छी ।।

अन्तिम विलाप
हओ बौआ  !  नहिञे  छुटलै ई ।
चचरी  पर   संगहि  जड़तै  ई ।
जँऽ  पहिने  से  सब  बुझितियै,
ठोर  कहाँ  धरितहुँ  हम  खैनी !!

हम्मर सलाह
अस्सी चुटकी  आ  नब्बे ताल ।
ठोर पर  खैनी  करैछ  कमाल ।
गीत - गीत  छै,  बात ने मानू;
नञि तँऽ होयत जान - जपाल ।।

संकल्पक उसास
छोड़ू    बीड़ी - हुक्का - पीनी ।
हर  स्वरूपमे  नाशक   खैनी ।
संकल्पक  सम्बल  जँऽ ढीठगर,
के  कहैछ - नञि छूटए खैनी ।।




* काँकोड़ = कैन्सर नामक बेमारीक पर्याय (CANCER-DISEASE) = खैनी खएनिहार बहुत लोक सभ केर दलील रहैत छन्हि कि फलना तँऽ खैनी - बीड़ी - पीनी किछु सेवन नञि करैत छल पर तइयो ओकरा कैन्सर भऽ गेलै = मतलब कि ओ लोकनि किन्नहु खैनी नञि छोड़ताह ।




मैथिली पाक्षिक इण्टरनेट पत्रिका विदेह केर ‍190म अंक (‍15 नवम्बर 2015) (वर्ष 8, मास 95, अंक ‍190) मे प्रकाशित ।



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