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मिथिलाक पर्यायी नाँवसभ

मिथिलाभाषाक (मैथिलीक) बोलीसभ

Saturday, 6 June 2015

पद्य - ‍१०९ - भूकम्प - ३ (कविता)


भूकम्प - ३



दौगि  रहल अछि,
भागि  रहल अछि,
लोक काटए हड़कम्प ।

आहि रौ  दैबा !
ई  की   भेलै !
भऽ  रहलै  भूकम्प ।।

भागै  जो   खरिहानहिमे, जे  पड़ती  आस - पास ।
एहेन दशामे  की कहियौ,  छै  दैबो  केर  ने आश ।
चौंतीस केर खिस्सा सुनने छी, देखल  आइ प्रत्यक्ष ।
सद्यः  धरती  डोलि रहल छै, केहेन  भेलै  अनर्थ ।
एहि  ठाँ  बेशी,
किछु नञि भेलै,
ओहि ठाँ नाश प्रचण्ड ।
आहि रौ दैबा !  ई की भेलै !  भऽ रहलै  भूकम्प ।।

काठमाण्डू तँऽ उजरि गेल, अगनित छै खसल लहास ।
जे जहिना छल, ताहि रूपमे,  भऽ गेल कालक ग्रास ।
सुनने छलियै,  पढ़ने छलियै,  देखल  पहिलहि  बेर ।
अति उदास - भयभीत मोन, कहइछ - ने दोसर बेर ।
आइ मनुक्खक,
आ  विज्ञानक,
टूटल  सकल घमण्ड ।
आहि रौ दैबा !  ई की भेलै !  भऽ रहलै  भूकम्प ।।

बाँचल जे,  से राति काटैए,  महल  छोड़ि  पड़तीमे ।
बाँचल,  देखने प्राण रहए ओ,  अपन  खेत अबटीमे ।
जे देखलक, से बिसरि सकत ने,  ई घटना जिनगीमे ।
कोना कऽ बिसरत, लोक पिअरगर पाटल जे धरतीमे ।

ओएह   बचल,
जक्कर आयुर्दा,
लिखल रहए अखण्ड ।
आहि रौ दैबा !  ई की भेलै !  भऽ रहलै  भूकम्प ।।




06 JUNE 2015 कऽ प्रकाशनार्थ मिथिला दर्पण केर सम्पादकीय कार्यालयकेँ प्रेषित ।


डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह

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